Salmos 32

HIN2010

1 धन्य है वह जन जिसके पाप क्षमा हुए।

2 धन्य है वह जन

3 हे परमेश्वर, मैंने तुझसे बार बार विनती की,

4 हे परमेश्वर, तूने मेरा जीवन दिन रात कठिन से कठिनतर बना दिया।

5 किन्तु फिर मैंने यहोवा के समक्ष अपने सभी पापों को मानने का निश्चय कर लिया है। हे यहोवा, मैंने तुझे अपने पाप बता दिये।

6 इसलिए, परमेश्वर, तेरे भक्तों को तेरी विनती करनी चाहिए।

7 हे परमेश्वर, तू मेरा रक्षास्थल है।

8 यहोवा कहता है, “मैं तुझे जैसे चलना चाहिए सिखाऊँगा

9 सो तू घोड़े या गधे सा बुद्धिहीन मत बन। उन पशुओं को तो मुखरी और लगाम से चलाया जाता है।

10 दुर्जनों को बहुत सी पीड़ाएँ घेरेंगी।

11 सज्जन तो यहोवा में सदा मगन और आनन्दित रहते हैं।

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