Lamentações 3

HIN2010

1 मैं एक ऐसा व्यक्ति हूँ जिसने बहुतेरी यातनाएँ भोगी है;

2 यहोवा मुझको लेकर के चला

3 यहोवा ने अपना हाथ मेरे विरोध में कर दिया।

4 उसने मेरा मांस, मेरा चर्म नष्ट कर दिया।

5 यहोवा ने मेरे विरोध में, कड़वाहट और आपदा फैलायी है।

6 उसने मुझे अन्धेरे में बिठा दिया था।

7 यहोवा ने मुझको भीतर बंद किया, इससे मैं बाहर आ न सका।

8 यहाँ तक कि जब मैं चिल्लाकर दुहाई देता हूँ,

9 उसने पत्थर से मेरी राह को मूंद दिया है।

10 यहोवा उस भालू सा हुआ जो मुझ पर आक्रमण करने को तत्पर है।

11 यहोवा ने मुझे मेरी राह से हटा दिया।

12 उसने अपना धनुष तैयार किया।

13 मेरे पेट में बाण मार दिया।

14 मैं अपने लोगों के बीच हंसी का पात्र बन गया।

15 यहोवा ने मुझे कड़वी बातों से भर दिया कि मैं उनको पी जाऊँ।

16 उसने मेरे दांत पथरीली धरती पर गडा दिये।

17 मेरा विचार था कि मुझको शांति कभी भी नहीं मिलेगा।

18 स्वयं अपने आप से मैं कहने लगा था, “मुझे तो बस अब और आस नहीं है कि

19 हे यहोवा, तू मेरे दुखिया पन याद कर,

20 मुझको तो मेरी सारी यातनाएँ याद हैं

21 किन्तु उसी समय जब मैं सोचता हूँ, तो मुझको आशा होने लगती हैं।

22 यहोवा के प्रेम और करुणा का तो अत कभी नहीं होता।

23 हर सुबह वे नये हो जाते हैं!

24 मैं अपने से कहा करता हूँ, “यहोवा मेरे हिस्से में है।

25 यहोवा उनके लिये उत्तम है जो उसकी बाट जोहते हैं।

26 यह उत्तम है कि कोई व्यक्ति चुपचाप यहोवा की प्रतिक्षा करे कि

27 यह उत्तम है कि कोई व्यक्ति यहोवा के जुए को धारण करे,

28 व्यक्ति को चाहिये कि वह अकेला चुप बैठे ही रहे

29 उस व्यक्ति को चाहिये कि यहोवा के सामने वह दण्डवत प्रणाण करे।

30 उस व्यक्ति को चाहिये कि वह आपना गाल कर दे, उस व्यक्ति के सामने जो उस पर प्रहार करता हो।

31 उस व्यक्ति को चाहिये वह याद रखे कि यहोवा किसी को भी

32 यहोवा दण्ड देते हुए भी अपनी कृपा बनाये रखता है।

33 यहोवा कभी भी नहीं चाहता कि लोगों को दण्ड दे।

34 यहोवा को यह बातें नहीं भाती है:

35 उसको नहीं भाता है कि कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति को छले।

36 उसको नहीं भाता कि कोई व्यक्ति अदालत में किसी से छल करे।

37 जब तक स्वयं यहोवा ही किसी बात के होने की आज्ञा नहीं देता,

38 बुरी—भली बातें सभी परम प्रधान परमेश्वर के मुख से ही आती हैं।

39 कोई जीवित व्यक्ति शिकायत कर नहीं सकता

40 आओ, हम अपने कर्मो को परखें और देखँ,

41 आओ, स्वर्ग के परमेश्वर के लिये हम हाथ उठायें

42 आओ, हम उससे कहें, “हमने पाप किये हैं और हम जिद्दी बने रहे,

43 तूने क्रोध से अपने को ढांप लिया,

44 तूने अपने को बादल से ढांप लिया।

45 तूने हमको दूसरे देशों के लिये ऐसा बनाया

46 हमारे सभी शत्रु

47 हम भयभीत हुए हैं हम गर्त में गिर गये हैं।

48 मेरी आँखों से आँसुओं की नदियाँ बही!

49 मेरे नयन बिना रूके बहते रहेंगे!

50 हे यहोवा, मैं तब तक विलाप करता रहूँगा

51 जब मैं देखा करता हूँ जो कुछ मेरी नगरी की युवतियों के साथ घटा

52 जो लोग व्यर्थ में ही मेरे शत्रु बने है,

53 जीते जी उन्होंने मुझको घड़े में फेंका

54 मेरे सिर पर से पानी गुज़र गया था।

55 हे यहोवा, मैंने तेरा नाम पुकारा।

56 तूने मेरी आवाज़ को सुना।

57 जब मैंने तेरी दुहाई दी, उसी दिन तू मेरे पास आ गया था।

58 हे यहोवा, मेरे अभियोग में तूने मेरा पक्ष लिया।

59 हे यहोवा, तूने मेरी विपत्तियाँ देखी हैं,

60 तूने स्वयं देखा है कि शत्रुओं ने मेरे साथ कितना अन्याय किया।

61 हे यहोवा, तूने सुना है कि वे मेरा अपमान कैसे करते हैं।

62 मेरे शत्रुओं के वचन और विचार

63 देखो यहोवा, चाहे वे बैठे हों, चाहे वे खड़े हों,

64 हे यहोवा, उनके साथ वैसा ही कर जैसा उनके साथ करना चाहिये!

65 उनका मन हठीला कर दे!

66 क्रोध में भर कर तू उनका पीछा कर!

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