1 फिर अय्यूब ने उत्तर देते हुए कहा,
2 “यदि मेरी पीड़ा को तौला जा सके
3 मेरी व्यथा समुद्र की समूची रेत से भी अधिक भारी होंगी।
4 सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बाण मुझ में बिधे हैं और
5 तेरे शब्द कहने के लिये आसान हैं जब कुछ भी बुरा नहीं घटित हुआ है।
6 भोजन बिना नमक के बेस्वाद होता है
7 इस भोजन को छूने से मैं इन्कार करता हूँ।
8 “काश! मुझे वह मिल पाता जो मैंने माँगा है।
9 काश! परमेश्वर मुझे कुचल डालता
10 यदि वह मुझे मारता है तो एक बात का चैन मुझे रहेगा,
11 “मेरी शक्ति क्षीण हो चुकी है अत: जीते रहने की आशा मुझे नहीं है।
12 मैं चट्टान की भाँति सुदृढ़ नहीं हूँ।
13 अब तो मुझमें इतनी भी शक्ति नहीं कि मैं स्वयं को बचा लूँ।
14 “क्योंकि वह जो अपने मित्रों के प्रति निष्ठा दिखाने से इन्कार करता है।
15 किन्तु मेरे बन्धुओं, तुम विश्वासयोग्य नहीं रहे।
16 जब वे बर्फ से और पिघलते हुए हिम सा रूँध जाती है।
17 और जब मौसम गर्म और सूखा होता है
18 व्यापारियों के दल मरुभूमि में अपनी राहों से भटक जाते हैं
19 तेमा के व्यापारी दल जल को खोजते रहे
20 वे आश्वत थे कि उन्हें जल मिलेगा
21 अब तुम उन जलधाराओं के समान हो।
22 क्या मैंने तुमसे सहायता माँगी नहीं।
23 क्या मैंने तुमसे कहा कि शत्रुओं से मुझे बचा लो
24 “अत: अब मुझे शिक्षा दो और मैं शान्त हो जाऊँगा।
25 सच्चे शब्द सशक्त होते हैं
26 क्या तुम मेरी आलोचना करने की योजनाऐं बनाते हो
27 यहाँ तक कि तुम जुऐ में उन बच्चों की वस्तुओं को छीनना चाहते हो,
28 किन्तु अब मेरे मुख को पढ़ो।
29 अत:, अपने मन को अब परिवर्तित करो।
30 मैं झूठ नहीं कह रहा हूँ। मुझको भले