1 “मैंने अपनी आँखो के साथ एक सन्धि की है कि
2 सर्वशक्तिमान परमेश्वर लोगों के साथ कैसा करता है
3 दुष्ट लोगों के लिये परमेश्वर संकट और विनाश भेजता है,
4 मैं जो कुछ भी करता हूँ परमेश्वर जानता है
5 “यदि मैंने झूठा जीवन जिया हो
6 तो वह मुझको खरी तराजू से तौले,
7 यदि मैं खरे मार्ग से हटा होहूँ
8 तो मेरी उपजाई फसल अन्य लोग खा जाये
9 “यदि मैं स्त्रियों के लिये कामुक रहा होहूँ,
10 तो मेरी पत्नी दूसरों का भोजन तैयार करे
11 क्यों क्योंकि यौन पाप लज्जापूर्ण होता है
12 व्यभिचार उस पाप के समान है, जो जलाती और नष्ट कर डालती है।
13 “यदि मैं अपने दास—दासियों के सामने उस समय निष्पक्ष नहीं रहा,
14 तो जब मुझे परमेश्वर के सामने जाना होगा,
15 परमेश्वर ने मुझको मेरी माता के गर्भ में बनाया, और मेरे दासों को भी उसने माता के गर्भ में हीं बनाया,
16 “मैंने कभी भी दीन जन की सहायता को मना नहीं किया।
17 मैं स्वार्थी नहीं रहा।
18 ऐसे बच्चों के लिये जिनके पिता नहीं है, मैं पिता के जैसा रहा हूँ।
19 जब मैंने किसी को इसलिये कष्ट भोगते पाया कि उसके पास वस्त्र नहीं हैं,
20 तो मैं सदा उन लोगों को वस्त्र देता रहा,
21 यदि कोई मैंने अनाथ को छलने का जतन अदालत में किया हो
22 तो मेरा हाथ मेरे कंधे के जोड़ से ऊतर जाये
23 किन्तु मैंने तो कोई वैसा बुरा काम नहीं किया।
24 “मैंने कभी अपने धन का भरोसा न किया,
25 मैंने कभी अपनी धनिकता का गर्व नहीं किया
26 मैंने कभी चमकते सूरज की पूजा नहीं की
27 मैंने कभी इतनी मूर्खता नहीं की
28 यदि मैंने इनमें से कुछ किया तो वो मेरा पाप हो और मुझे उसका दण्ड मिले।
29 “जब मेरे शत्रु नष्ट हुए तो
30 मैंने अपने मुख को अपने शत्रु से बुरे शब्द बोल कर पाप नहीं करने दिया
31 मेरे घर के सभी लोग जानते हैं कि
32 मैंने सदा अनजानों को अपने घर में बुलाया,
33 दूसरे लोग अपने पाप को छुपाने का जतन करते हैं,
34 क्यों क्योंकि लोग कहा करते हैं कि मैं उससे कभी नहीं डरा।
35 “ओह! काश कोई होता जो मेरी सुनता!
36 क्योंकि निश्चय ही मैं वह लिखावट अपने निज कन्धों पर रख लूँगा
37 मैंने जो कुछ भी किया है, मैं उसे परमेश्वर को समझाऊँगा।
38 “यदि जिस खेत पर मैं खेती करता हूँ उसको मैंने चुराया हो
39 और यदि मैंने कभी बिना मजदूरों को मजदूरी दिये हुये,
40 हाँ! यदि इनमें से कोई भी बुरा काम मैंने किया हो,