Jó 30

HIN2010

1 “अब, आयु में छोटे लोग मेरा माजक बनाते हैं।

2 उन युवा पुरुषों के पिता मुझे सहारा देने की कोई शक्ति नहीं रखते हैं,

3 वे व्यक्ति मुर्दे जैसे हैं क्योंकि खाने को उनके पास कुछ नहीं है

4 वे लोग मरुभूमि में खारे पौधों को उखाड़ते हैं

5 वे लोग, दूसरे लोगों से भगाये गये हैं

6 ऐसे वे बूढ़े लोग सूखी हुई नदी के तलों में

7 वे झाड़ियों के भीतर रेंकते हैं।

8 वे बेकार के लोगों का दल है, जिनके नाम तक नहीं हैं।

9 “अब ऐसे उन लोगों के पुत्र मेरी हँसी उड़ाने को मेरे विषय में गीत गाते हैं।

10 वे युवक मुझसे घृणा करते हैं।

11 परमेश्वर ने मेरे धनुष से उसकी डोर छीन ली है और मुझे दुर्बल किया है।

12 वे युवक मेरी दाहिनी ओर मुझ पर प्रहार करते हैं।

13 वे युवक मेरी राह पर निगरानी रखते हैं कि मैं बच निकल कर भागने न पाऊँ।

14 वे मुझ पर ऐसे वार करते हैं, जैसे वे दिवार में सूराख निकाल रहें हो।

15 मुझको भय जकड़ लेता है।

16 “अब मेरा जीवन बीतने को है और मैं शीघ्र ही मर जाऊँगा।

17 मेरी सब हड्डियाँ रात को दुखती हैं,

18 मेरे गिरेबान को परमेश्वर बड़े बल से पकड़ता है,

19 परमेश्वर मुझे कीच में धकेलता है

20 “हे परमेश्वर, मैं सहारा पाने को तुझको पुकारता हूँ,

21 हे परमेश्वर, तू मेरे लिये निर्दयी हो गया है,

22 हे परमेश्वर, तू मुझे तीव्र आँधी द्वारा उड़ा देता है।

23 मैं जानता हूँ तू मुझे मेरी मृत्यु की ओर ले जा रहा है

24 “किन्तु निश्चय ही कोई मरे हुये को,

25 हे परमेश्वर, तू तो यह जानता है कि मैं उनके लिये रोया जो संकट में पड़े हैं।

26 किन्तु जब मैं भला चाहता था, तो बुरा हो जाता था।

27 मैं भीतर से फट गया हूँ और यह ऐसा है कि

28 मैं सदा ही व्याकुल रहता हूँ। मुझको चैन नहीं मिल पाता है।

29 मैं जंगली कुत्तों के जैसा बन गया हूँ,

30 मेरी त्वचा काली पड़ गई है।

31 मेरी वीणा करुण गीत गाने की सधी है

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