1 अपनी बात को जारी रखते हुये अय्यूब ने कहा:
2 “काश! मेरा जीवन वैसा ही होता जैसा गुजरे महीनों में था।
3 मैं ऐसे उस समय की इच्छा करता हूँ जब परमेश्वर का प्रकाश मेरे शीश पर चमक रहा था।
4 ऐसे उन दिनों की मैं इच्छा करता हूँ, जब मेरा जीवन सफल था और परमेश्वर मेरा निकट मित्र था।
5 ऐसे समय की मैं इच्छा करता हूँ, जब सर्वशक्तिशाली परमेश्वर अभी तक मेरे साथ में था
6 ऐसा तब था जब मेरा जीवन बहुत अच्छा था, ऐसा लगा करता था कि दूध—दही की नदियाँ बहा करती थी,
7 “ये वे दिन थे जब मैं नगर—द्वार और खुले स्थानों में जाता था,
8 वहाँ सभी लोग मेरा मान किया करते थे।
9 जब लोगों के मुखिया मुझे देख लेते थे,
10 यहाँ तक की अत्यन्त महत्वपूर्ण नेता भी अपना स्वर नीचा कर लेते थे,
11 जिस किसी ने भी मुझको बोलते सुना, मेरे विषय में अच्छी बात कही,
12 क्यों क्योंकि जब किसी दीन ने सहायता के लिये पुकारा, मैंने सहायता की।
13 मुझको मरते हुये व्यक्ति की आशीष मिली,
14 मेरा वस्त्र खरा जीवन था,
15 मैं अंधो के लिये आँखे बन गया
16 दीन लोगों के लिये मैं पिता के तुल्य था,
17 मैं दुष्ट लोगों की शक्ति नष्ट करता था।
18 “मैं सोचा करता था कि सदा जीऊँगा
19 मैं एक ऐसा स्वस्थ वृक्ष बनूँगा जिसकी जड़े सदा जल में रहती हों
20 मेरी शान सदा ही नई बनी रहेगी,
21 “पहले, लोग मेरी बात सुना करते थे,
22 मेरे बोल चुकने के बाद, उन लोगों के पास जो मेरी बात सुनते थे, कुछ भी बोलने को नहीं होता था।
23 लोग जैसे वर्षा की बाट जोहते हैं वैसे ही वे मेरे बोलने की बाट जोहा करते थे।
24 जब मैं दया करने को उन पर मुस्कराता था, तो उन्हें इसका यकीन नहीं होता था।
25 मैंने उत्तरदायित्व लिया और लोगों के लिये निर्णय किये, मैं नेता बन गया।