Jó 28

HIN2010

1 “वहाँ चाँदी की खान है जहाँ लोग चाँदी पाते है,

2 लोग धरती से खोद कर लोहा निकालते है,

3 लोग गुफाओं में प्रकाश को लाते हैं वे गुफाओं की गहराई में खोजा करते हैं,

4 जहाँ लोग रहते है उससे बहुत दूर लोग गहरे गढ़े खोदा करते हैं

5 भोजन धरती की सतह से मिला करता है,

6 धरती के भीतर चट्टानों के नीचे नीलम मिल जाते हैं,

7 जंगल के पक्षी धरती के नीचे की राहें नहीं जानते हैं

8 इस राह पर हिंसक पशु नहीं चले,

9 मजदूर कठिन चट्टानों को खोदते हैं

10 काम करने वाले सुरंगे काटते हैं,

11 काम करने वाले बाँध बाँधा करते हैं कि पानी कहीं ऊपर से होकर न वह जाये।

12 “किन्तु कोई व्यक्ति विवेक कहाँ पा सकता है

13 ज्ञान कहाँ रहता है लोग नहीं जानते हैं,

14 सागर की गहराई कहती है, ‘मुझ में विवेक नहीं।’

15 विवेक को अति मूल्यवान सोना भी मोल नहीं ले सकता है,

16 विवेक ओपीर देश के सोने से

17 विवेक सोने और स्फटिक से अधिक मूल्यवान है,

18 विवेक मूंगे और सूर्यकांत मणि से अति मूल्यवान है।

19 जितना उत्तम विवेक है कूश देश का पदमराग भी उतना उत्तम नहीं है।

20 “तो फिर हम कहाँ विवेक को पाने जायें

21 विवेक धरती के हर व्यक्ति से छुपा हुआ है।

22 मृत्यु और विनाश कहा करते है कि

23 “किन्तु बस परमेश्वर विवेक तक पहुँचने की राह को जानता है।

24 परमेश्वर विवेक को जानता है क्योंकि वह धरती के आखिरी छोर तक देखा करता है।

25 जब परमेश्वर ने पवन को उसकी शक्ति प्रदान की

26 और जब परमेश्वर ने निश्चय किया कि उसे कहाँ वर्षा को भेजना है,

27 तब परमेश्वर ने विवेक को देखा था,

28 और लोगों से परमेश्वर ने कहा था कि

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