1 फिर अय्यूब के तीनों मित्रों ने अय्यूब को उत्तर देने का प्रयत्न करना छोड़ दिया। क्योंकि अय्यूब निश्चय के साथ यह मानता था कि वह स्वयं सचमुच दोष रहित हैं।
2 वहाँ एलीहू नाम का एक व्यक्ति भी था। एलीहू बारकेल का पुत्र था। बारकेल बुज़ नाम के एक व्यक्ति के वंशज था। एलीहू राम के परिवार से था। एलीहू को अय्यूब पर बहुत क्रोध आया क्योंकि अय्यूब कह रहा था कि वह स्वयं नेक है और वह परमेश्वर पर दोष लगा रहा था।
3 एलीहू अय्यूब के तीनों मित्रों से भी नाराज़ था क्योंकि वे तीनों ही अय्यूब के प्रश्नों का युक्ति संगत उत्तर नहीं दे पाये थे और अय्यूब को ही दोषी बता रहे थे। इससे तो फिर ऐसा लगा कि जैसे परमेश्वर ही दोषी था।
4 वहाँ जो लोग थे उनमें एलीहू सबसे छोटा था इसलिए वह तब तक बाट जोहता रहा जब तक हर कोई अपनी अपनी बात पूरी नहीं कर चुका। तब उसने सोचा कि अब वह बोलना शुरु कर सकता हैं।
5 एलीहू ने जब यह देखा कि अय्यूब के तीनों मित्रों के पास कहने को और कुछ नहीं है तो उसे बहुत क्रोध आया।
6 सो एलीहू ने अपनी बात कहना शुरु किया। वह बोला:
7 मैंने मन में सोचा कि बड़े को पहले बोलना चाहिये,
8 किन्तु व्यक्ति में परमेश्वर की आत्मा बुद्धि देती है
9 आयु में बड़े व्यक्ति ही नहीं ज्ञानी होते है।
10 “सो इसलिये मैं एलीहू जो कुछ मैं जानता हूँ।
11 जब तक तुम लोग बोलते रहोगे, मैंने धैर्य सेप्रतिक्षा की,
12 जब तुम मार्मिक शब्दों से जतन कर रहे थे, अय्यूब को उत्तर देने का तो मैं ध्यान से सुनता रहा।
13 तुम तीनों ही लोगों को यही नहीं कहना चाहिये था कि तुमने ज्ञान को प्राप्त कर लिया है।
14 किन्तु अय्यूब मेरे विरोध में नहीं बोल रहा था,
15 “अय्यूब, तेरे तीनो ही मित्र असमंजस में पड़ें हैं,
16 ये तीनों लोग यहाँ चुप खड़े हैं
17 नहीं! मैं भी निज उत्तर दूँगा।
18 क्योंकि मेरे पास सहने को बहुत है मेरे भीतर जो आत्मा है,
19 मैं अपने भीतर ऐसी दाखमधु सा हूँ, जो शीघ्र ही बाहर उफन जाने को है।
20 सो निश्चय ही मुझे बोलना चाहिये, तभी मुझे अच्छा लगेगा।
21 इस बहस में मैं किसी भी व्यक्ति का पक्ष नहीं लूँगा
22 मैं नहीं जानता हूँ कि कैसे किसी व्यक्ति की खुशामद की जाती है।