1 फिर अय्यूब ने उत्तर देते हुये कहा:
2 “मैं आज भी बुरी तरह शिकायत करता हूँ कि परमेश्वर मुझे कड़ा दण्ड दे रहा है,
3 काश! मैं यह जान पाता कि उसे कहाँ खोजूँ!
4 मैं अपनी कथा परमेश्वर को सुनाता,
5 मैं यह जानना चाहता हूँ कि परमेश्वर कैसे मेरे तर्को का उत्तर देता है,
6 क्या परमेश्वर अपनी महाशक्ति के साथ मेरे विरुद्ध होता
7 मैं एक नेक व्यक्ति हूँ।
8 “किन्तु यदि मैं पूरब को जाऊँ तो परमेश्वर वहाँ नहीं है
9 परमेश्वर जब उत्तर में क्रियाशील रहता है तो मैं उसे देख नहीं पाता हूँ।
10 किन्तु परमेश्वर मेरे हर चरण को देखता है, जिसको मैं उठाता हूँ।
11 परमेश्वर जिस को चाहता है मैं सदा उस पर चला हूँ,
12 मैं सदा वही बात करता हूँ जिनकी आशा परमेश्वर देता है।
13 “किन्तु परमेश्वर कभी नहीं बदलता।
14 परमेश्वर ने जो भी योजना मेरे विरोध में बना ली है वही करेगा,
15 मैं इसलिये डरता हूँ, जब इन सब बातों के बारे में सोचता हूँ।
16 परमेश्वर मेरे हृदय को दुर्बल करता है और मेरी हिम्मत टूटती है।
17 यद्यपि मेरा मुख सघन अंधकार ढकता है