1 बुद्धि ह अपन घर बनाईस;
2 ओह अपन पसु के मांस रांधे हवय अऊ अंगूर के मंद तियार करे हवय;
3 ओह अपन सेवकमन ला पठोय हवय,
4 “जऊन मन सीधा-साधा अंय, ओमन मोर घर म आवंय!”
5 “आवव, मोर खाना खावव
6 अपन सीधा-साधा रसता ला छोंड़व, त तुमन जीयत रहिहू;
7 जऊन ह ठट्ठा करइया ला सिकछा देथे, ओकर बेजत्ती होथे;
8 ठट्ठा करइयामन ला झन डांट, नइं तो ओमन तोर ले घिन करहीं;
9 बुद्धिमान मनखे ला सिकछा दे, त ओमन अऊ बुद्धिमान होहीं;
10 यहोवा के भय मनई बुद्धि के सुरूआत अय,
11 काबरकि परमेसर के दुवारा तोर उमर बढ़ही,
12 कहूं तेंह बुद्धिमान अस, त तोर बुद्धि के कारन तोला ईनाम मिलही;
13 मुरूखता ह एक ब्यवस्थाहीन माईलोगन सहीं अय;
14 ओह अपन घर के कपाट करा बईठथे;
15 अऊ जऊन मन उहां ले होवत, अपन रसता म सीधा जावत रहिथें,
16 “जऊन मन सीधा-साधा अंय, ओमन मोर घर म आवंय!”
17 “चोराय पानी ह मीठ लगथे;
18 पर ओमन नइं जानंय कि उहां मरे मनखेमन हवंय,