1 सुलेमान के नीतिबचन:
2 बेईमानी ले कमाय धन ले लाभ नइं होवय,
3 यहोवा ह धरमी मनखे ला भूखा रहन नइं देवय,
4 काम म ढिलई करइया मनखे गरीब हो जाथे,
5 गरमी के महिना म जऊन ह फसल ला संकेलथे, ओह बुद्धिमान बेटा ए,
6 धरमी मनखे ला बहुंत आसीस मिलथे,
7 धरमी के नांव ह आसीस देय म उपयोग होथे,
8 बुद्धिमान ह हिरदय म हुकूम ला गरहन करथे,
9 जऊन ह ईमानदारी से चलथे, ओह निडर रहिथे,
10 जऊन ह गलत इरादा से आंखी मारथे, ओकर ले दुख मिलथे,
11 धरमी मनखे के मुहूं ले जिनगी के बात निकलथे,
12 काकरो ले घिन करई ह झगरा ला सुरू करथे,
13 समझदार मनखे के बातचीत म बुद्धि पाय जाथे,
14 बुद्धिमान ह गियान ला इकट्ठा करथे,
15 धनवानमन के धन ह ओमन के गढ़वाला सहर होथे,
16 धरमी मनखे के मजदूरी जिनगी अय,
17 जऊन ह अनुसासन ला मानथे, ओह जिनगी के रसता ला देखाथे,
18 जऊन ह लबारी मारके बईरता ला छुपाथे
19 जिहां जादा बात होथे, उहां पाप घलो होथे,
20 धरमी मनखे के बचन ह उत्तम चांदी सहीं अय,
21 धरमी मनखे के बात ले बहुंते जन के भलई होथे,
22 यहोवा के आसीस ले धन मिलथे,
23 मुरूख ला खराप काम करई म खुसी मिलथे,
24 जऊन बात ले दुस्ट मनखे ह डरथे, ओहीच बात ओकर संग होही,
25 जब बिपत्ति चले जाथे, त ओकर संग दुस्टमन के घलो अन्त हो जाथे,
26 जइसे दांत बर खट्टई अऊ आंखी बर धुआं होथे,
27 यहोवा के भय माने ले मनखे के उमर ह बढ़थे,
28 धरमी जन ला आसा रखई म आनंद मिलथे,
29 यहोवा के रसता ह निरदोसीमन बर सरन-स्थान ए,
30 धरमी जन सदा अटल बने रहिही,
31 धरमी के मुहूं ले बुद्धि के बात निकलथे,
32 धरमी के मुहूं ले समझदारी के बात निकलथे,