1 एकर बाद, अयूब ह अपन मुहूं खोलके अपन जनम दिन ला धिक्कारे लगिस।
2 ओह कहिस:
3 “नास हो जावय ओ दिन, जऊन दिन मोर जनम होईस,
4 ओ दिन ह अंधियार हो जावय;
5 दुख अऊ मिरतू के छइहां ह ओ दिन के ऊपर अधिकार करय;
6 ओ रथिया ला घोर अंधियार ह जकड़ डारय,
7 ओ रथिया ह ठड़गी हो जावय;
8 जऊन मन दिनमन ला धिक्कारथें, ओमन ओ दिन ला धिक्कारंय,
9 ओकर बिहनियां के तारामन अंधियार हो जावंय;
10 काबरकि ओ दिन ह मोर दाई के कोख ला मोर बर बंद नइं करिस
11 “जनम के बेरा ही मेंह काबर नास नइं हो गेंव,
12 मोला थामे बर उहां माड़ीमन काबर रिहिन
13 कहूं अइसने नइं होतिस, त मेंह सांति म चुपेचाप पड़े रहितेंव;
14 मेंह धरती के ओ राजामन अऊ सासन करइयामन संग होतेंव
15 या ओ राजकुमारमन संग होतेंव, जेमन करा सोन रिहिस,
16 या बिगर समय के गिरे गरभ के लइका सहीं मोला भुइयां म काबर तोपे नइं गीस,
17 उहां दुस्ट मनखे के दुख देवई ह खतम हो जाथे,
18 उहां बंधक बनाय गे मनखेमन घलो अपन सुख के आनंद उठाथें;
19 उहां छोटे-बड़े जम्मो झन रहिथें,
20 “ओमन ला अंजोर काबर दिये जाथे, जऊन मन दुख म हवंय,
21 जऊन मन मऊत के कामना करथें, पर मऊत ओमन ला आवय नइं,
22 जऊन मन कि खुसी अऊ आनंद ले भरे रहिथें,
23 ओ मनखे ला जिनगी काबर दिये जाथे
24 काबरकि आह भरई ह हर दिन के मोर जेवन हो गे हवय;
25 जऊन बात ले मेंह डरावत रहेंव, ओही ह मोर ऊपर आ गे हवय;
26 मोला न तो सुख, न ही सांति हवय;