1 मोर मन ह टूट गे हवय,
2 खचित ठट्ठा करइयामन मोर चारों कोति हवंय;
3 “हे परमेसर, मोला छोंड़ाय बर जमानत दे।
4 तेंह ओमन के समझ के सक्ति ला बंद कर दे हवस;
5 कहूं कोनो अपन लाभ बर अपन संगीमन के चारी-चुगली करथे,
6 “परमेसर ह मोला जम्मो झन बर एक कहावत बना दे हवय,
7 मोर आंखीमन दुख के कारन धुंधला गे हवंय;
8 सीधवा मनखेमन येला देखके अचम्भो करथें;
9 तभो ले, धरमीमन अपन रद्दा ला धरे रहिहीं,
10 “पर आवव, तुमन जम्मो झन, फेर कोसिस करव!
11 मोर जीये के दिनमन तो बीत गीन, मोर योजनामन छितिर-बितिर हो गे हवंय।
12 ओमन रथिया ला दिन म बदल देथें;
13 कहूं मेंह कोनो घर के आसा करंव, त ओह सिरिप कबर अय,
14 कहूं मेंह भ्रस्ट काम ला कहंव, ‘तें मोर ददा अस,’
15 त फेर मोर आसा कहां हवय—
16 का मोर आसा ह मिरतू के कपाट करा खाल्हे चल दीही?