1 हे परमेश्वर, हमने अपने कानों से सुना है,
2 अपने भुजबल से आपने जनताओं को निकाल दिया
3 यह अधिकार उन्होंने अपनी तलवार के बल पर नहीं किया,
4 मेरे परमेश्वर, आप मेरे राजा हैं,
5 आपके द्वारा ही हम अपने शत्रुओं पर प्रबल हो सकेंगे;
6 मुझे अपने धनुष पर भरोसा नहीं है,
7 हमें अपने शत्रुओं पर विजय आपने ही प्रदान की है,
8 हम निरंतर परमेश्वर में गर्व करते रहे,
9 किंतु अब आपने हमें लज्जित होने के लिए शोकित छोड़ दिया है;
10 आपके दूर होने के कारण, हमें शत्रुओं को पीठ दिखानी पड़ी.
11 आपने हमें वध के लिए निर्धारित भेड़ों समान छोड़ दिया है.
12 आपने अपनी प्रजा को मिट्टी के मोल बेच दिया,
13 अपने पड़ोसियों के लिए अब हम निंदनीय हो गए हैं,
14 राष्ट्रों में हम उपमा होकर रह गए हैं;
15 सारे दिन मेरा अपमान मेरे सामने झूलता रहता है,
16 उस शत्रु की वाणी, जो मेरी निंदा एवं मुझे कलंकित करता है,
17 हमने न तो आपको भुला दिया था,
18 हमारे हृदय आपसे बहके नहीं;
19 फिर भी आपने हमें उजाड़ कर गीदड़ों का बसेरा बना दिया;
20 यदि हम अपने परमेश्वर को भूल ही जाते
21 क्या परमेश्वर को इसका पता न चल गया होता,
22 फिर भी आपके निमित्त हम दिन भर मृत्यु का सामना करते रहते हैं;
23 जागिए, प्रभु! सो क्यों रहे हैं?
24 आपने हमसे अपना मुख क्यों छिपा लिया है
25 हमारे प्राण धूल में मिल ही चुके हैं;
26 उठकर हमारी सहायता कीजिए;