1 “किंतु अब तो वे ही मेरा उपहास कर रहे हैं,
2 वस्तुतः उनकी क्षमता तथा कौशल मेरे किसी काम का न था,
3 अकाल एवं गरीबी ने उन्हें कुरूप बना दिया है,
4 वे झाड़ियों के मध्य से लोनिया साग एकत्र करते हैं,
5 वे समाज से बहिष्कृत कर दिए गए हैं,
6 परिणाम यह हुआ कि वे अब भयावह घाटियों में,
7 झाड़ियों के मध्य से वे पुकारते रहते हैं;
8 वे मूर्ख एवं अपरिचित थे,
9 “अब मैं ऐसों के व्यंग्य का पात्र बन चुका हूं;
10 उन्हें मुझसे ऐसी घृणा हो चुकी है, कि वे मुझसे दूर-दूर रहते हैं;
11 ये दुःख के तीर मुझ पर परमेश्वर द्वारा ही छोड़े गए हैं,
12 मेरी दायीं ओर ऐसे लोगों की सन्तति विकसित हो रही है.
13 वे मेरे निकलने के रास्ते बिगाड़ते;
14 वे आते हैं तो ऐसा मालूम होता है मानो वे दीवार के सूराख से निकलकर आ रहे हैं;
15 सारे भय तो मुझ पर ही आ पड़े हैं;
16 “अब मेरे प्राण मेरे अंदर में ही डूबे जा रहे हैं;
17 रात्रि में मेरी हड्डियों में चुभन प्रारंभ हो जाती है;
18 बड़े ही बलपूर्वक मेरे वस्त्र को पकड़ा गया है
19 परमेश्वर ने मुझे कीचड़ में डाल दिया है,
20 “मैं आपको पुकारता रहता हूं,
21 आप मेरे प्रति क्रूर हो गए हैं;
22 जब आप मुझे उठाते हैं, तो इसलिये कि मैं वायु प्रवाह में उड़ जाऊं;
23 अब तो मुझे मालूम हो चुका है, कि आप मुझे मेरी मृत्यु की ओर ले जा रहे हैं,
24 “क्या वह जो, कूड़े के ढेर में जा पड़ा है,
25 क्या संकट में पड़े व्यक्ति के लिए मैंने आंसू नहीं बहाया?
26 जब मैंने कल्याण की प्रत्याशा की, मुझे अनिष्ट प्राप्त हुआ;
27 मुझे विश्रान्ति नही है, क्योंकि मेरी अंतड़ियां उबल रही हैं;
28 मैं तो अब सांत्वना रहित, विलाप कर रहा हूं;
29 मैं तो अब गीदड़ों का भाई
30 मेरी खाल काली हो चुकी है;
31 मेरा वाद्य अब करुण स्वर उत्पन्न कर रहा है,