1 तब अपने वचन में अय्योब ने कहा:
2 “उपयुक्त तो यह होता कि मैं उस स्थिति में जा पहुंचता जहां मैं कुछ माह पूर्व था,
3 जब परमेश्वर के दीपक का प्रकाश मेरे सिर पर चमक रहा था.
4 वे मेरी युवावस्था के दिन थे,
5 उस समय सर्वशक्तिमान मेरे साथ थे,
6 उस समय तो स्थिति ऐसी थी, मानो मेरे पैर मक्खन से धोए जाते थे,
7 “तब मैं नगर के द्वार में चला जाया करता था,
8 युवा सम्मान में मेरे सामने आने में हिचकते थे,
9 यहां तक कि शासक अपना वार्तालाप रोक देते थे
10 प्रतिष्ठित व्यक्ति शांत स्वर में वार्तालाप करने लगते थे,
11 मुझे ऐसे शब्द सुनने को मिलते थे ‘धन्य हैं वह,’
12 यह इसलिये, कि मैं उन दीनों की सहायता के लिए तत्पर रहता था, जो सहायता की दोहाई लगाते थे.
13 जो मरने पर था, उस व्यक्ति की समृद्धि मुझे दी गई है;
14 मैंने युक्तता धारण कर ली, इसने मुझे ढक लिया;
15 मैं दृष्टिहीनों के लिए दृष्टि हो गया
16 दरिद्रों के लिए मैं पिता हो गया;
17 मैंने दुष्टों के जबड़े तोड़े तथा उन्हें जा छुड़ाया,
18 “तब मैंने यह विचार किया, ‘मेरी मृत्यु मेरे घर में ही होगी
19 मेरी जड़ें जल तक पहुंची हुई हैं
20 सभी की ओर से मुझे प्रशंसा प्राप्त होती रही है,
21 “वे लोग मेरे परामर्श को सुना करते थे, मेरी प्रतीक्षा करते रहते थे,
22 मेरे वक्तव्य के बाद वे प्रतिक्रिया का साहस नहीं करते थे;
23 वे मेरे लिए वैसे ही प्रतीक्षा करते थे, जैसे वृष्टि की,
24 वे मुश्किल से विश्वास करते थे, जब मैं उन पर मुस्कुराता था;
25 उनका प्रधान होने के कारण मैं उन्हें उपयुक्त हल सुझाता था;