1 धर्मी व्यक्ति नाश होते हैं,
2 वे शांति पहचानते हैं,
3 “परंतु हे जादूगरनी,
4 तुम किस पर हंसते हो?
5 सब हरे वृक्ष के नीचे कामातुर होते हो और नालों में
6 तुम्हारा संबंध तो चट्टान के उन चिकने पत्थरों से है;
7 ऊंचे पर्वत पर तुमने अपना बिछौना लगाया है;
8 द्वार तथा द्वार के चौखट के पीछे
9 राजा से मिलने के लिए तुमने यात्रा की
10 तुम तो लंबे मार्ग के कारण थक चुके थे,
11 “कौन था वह जिससे तुम डरती थी
12 मैं तुम्हारे धर्म एवं कामों को बता दूंगा,
13 बुलाने पर,
14 तब यह कहा जाएगा:
15 क्योंकि जो महान, उत्तम और सदा-सर्वदा जीवित रहते हैं—
16 क्योंकि मैं सदा-सर्वदा वाद-विवाद करता न रहूंगा,
17 उसके लालच के कारण मैं उससे क्रोधित होकर;
18 मैंने उसका चालचलन देखा है, फिर भी अब उसको चंगा करूंगा;
19 मैं उनके होंठों के फल का रचनेवाला हूं.
20 परंतु दुष्ट लहराते हुए सागर समान है,
21 मेरे परमेश्वर का वचन है, “दुष्टों के लिए शांति नहीं.”