1 “परंतु अब हे मेरे दास याकोब,
2 याहवेह, जो तुम्हारे सहायक हैं,
3 क्योंकि मैं प्यासी भूमि पर जल,
4 वे घास के बीच अंकुरित होने लगेंगे,
5 कोई कहेगा, ‘मैं तो याहवेह का हूं’;
6 “वह जो याहवेह हैं,
7 मेरे समान है कौन? जब से मैंने मनुष्यों को ठहराया
8 तुम डरो मत, क्या मैंने बहुत पहले बता न दिया था.
9 वे सभी जो मूर्तियां बनाते हैं वे व्यर्थ हैं,
10 कौन है ऐसा निर्बुद्धि जिसने ऐसे देवता की रचना की या ऐसी मूर्ति बनाई,
11 देख उसके सभी साथियों को लज्जा का सामना करना पड़ेगा;
12 लोहार लोहे को अंगारों से गर्म करके
13 एक और शिल्पकार वह काठ को रूप देता है
14 वह देवदार वृक्षों को अपने लिए काटता है,
15 फिर इसे मनुष्य आग जलाने के लिए काम में लेता है;
16 इसका आधा तो जला देता है;
17 बचे हुए काठ से वह एक देवता का निर्माण कर लेता है, उस देवता की गढ़ी गई मूर्ति;
18 वे न तो कुछ जानते हैं और न ही कुछ समझते हैं;
19 उनमें से किसी को भी यह बात उदास नहीं करती,
20 उसने तो राख को अपना भोजन बना लिया है; उसे एक ऐसे दिल ने बहका दिया है, जो स्वयं भटक चुका है;
21 “हे याकोब, हे इस्राएल, इन सब बातों को याद कर,
22 तुम्हारे अपराधों को मैंने मिटा दिया है जैसे आकाश से बादल,
23 हे आकाश, आनंदित हो, क्योंकि याहवेह ने यह कर दिखाया है;
24 “याहवेह तुम्हें उद्धार देनेवाले हैं,
25 मैं झूठे लोगों की बात को व्यर्थ कर देता हूं
26 इस प्रकार याहवेह अपने दास के वचन को पूरा करता हैं,
27 मैं ही हूं, जो सागर की गहराई को आज्ञा देता हूं, ‘सूख जाओ,
28 मैं ही हूं वह, जिसने कोरेश के बारे में कहा था कि,