Salmos 55

HIN2010

1 हे परमेश्वर, मेरी प्रार्थना सुन।

2 हे परमेश्वर, कृपा करके मेरी सुन और मुझे उत्तर दे।

3 मेरे शत्रु ने मुझसे दुर्वचन बोले हैं। दुष्ट जनों ने मुझ पर चीखा।

4 मेरा मन भीतर से चूर—चूर हो रहा है,

5 मैं बहुत डरा हुआ हूँ।

6 ओह, यदि कपोत के समान मेरे पंख होते,

7 मैं उड़कर दूर निर्जन में जाता।

8 मैं दूर चला जाऊँगा

9 हे मेरे स्वमी, इस नगर में हिँसा और बहुत दंगे और उनके झूठों को रोक जो मुझको दिख रही है।

10 इस नगर में, हर कहीं मुझे रात—दिन विपत्ति घेरे है।

11 गलियों में बहुत अधिक अपराध फैला है।

12 यदि यह मेराशत्रु होता

13 ओ! मेरे साथी, मेरे सहचर, मेरे मित्र,

14 हमने आपस में राज की बातें बाँटी थी।

15 काश मेरे शत्रु अपने समय से पहले ही मर जायें।

16 मैं तो सहायता के लिए परमेश्वर को पुकारुँगा।

17 मैं तो अपने दु;ख को परमेश्वर से प्रात,

18 मैंने कितने ही युद्धों में लड़ायी लड़ी है।

19 वह शाश्वत सम्राट परमेश्वर मेरी सुनेगा

20 मेरे शत्रु अपने ही मित्रों पर वार करते।

21 मेरे शत्रु सचमुच मीठा बोलते हैं, और सुशांति की बातें करते रहते हैं।

22 अपनी चिंताये तुम यहोवा को सौंप दो।

23 इससे पहले कि उनकी आधी आयु बीते।

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