1 तब अय्यूब ने अपना मुँह खोला और उस दिन को कोसने लगा जब वह पैदा हुआ था।
2 उसने कहा:
3 “काश! जिस दिन मैं पैदा हुआ था, मिट जाये।
4 काश! वह दिन अंधकारमय होता,
5 काश! वह दिन अंधकारपूर्ण बना रहता जितना कि मृत्यु है।
6 उस रात को गहरा अंधकार जकड़ ले,
7 वह रात कुछ भी उत्पन्न न करे।
8 जादूगरों को शाप देने दो, उस दिन को वे शापित करें जिस दिन मैं पैदा हुआ।
9 उस दिन को भोर का तारा काला पड़ जाये।
10 क्यों क्योंकि उस रात ने मुझे पैदा होने से न रोका।
11 मैं क्यों न मर गया जब मैं पैदा हुआ था
12 क्यों मेरी माँ ने गोद में रखा
13 अगर मैं तभी मर गया होता
14 राजाओं और बुद्धिमान व्यक्तियों के साथ जो पृथ्वी पर पहले थे।
15 काश! मैं उन शासकों के साथ गाड़ा जाता
16 क्यों नहीं मैं ऐसा बालक हुआ
17 दुष्ट जन दु:ख देना तब छोड़ते हैं जब वे कब्र में होते हैं
18 यहाँ तक कि बंदी भी सुख से कब्र में रहते हैं।
19 हर तरह के लोग कब्र में रहते हैं चाहे वे महत्वपूर्ण हो या साधारण।
20 “कोई दु:खी व्यक्ति और अधिक यातनाएँ भोगता जीवित
21 ऐसा व्यक्ति मरना चाहता है लेकिन उसे मौत नहीं आती हैं।
22 ऐसे व्यक्ति कब्र पाकर प्रसन्न होते हैं
23 परमेश्वर उनके भविष्य को रहस्यपूर्ण बनाये रखता है
24 मैं भोजन के समयप्रसन्न होने के बजाय दु:खी आहें भरता हूँ।
25 मैं जिस डरावनी बात से डरता रहा कि कहीं वहीं मेरे साथ न घट जाये, वही मेरे साथ घट गई।
26 न ही मैं शान्त हो सकता हूँ, न ही मैं विश्राम कर सकता हूँ।