Jó 18

HIN2010

1 फिर शूही प्रदेश के बिल्दद ने उत्तर देते हूए कहा:

2 “अय्यूब, इस तरह की बातें करना तू कब छोड़ेगा

3 तू क्यों यह सोचता हैं कि हम उतने मूर्ख हैं जितनी मूर्ख गायें।

4 अय्यूब, तू अपने क्रोध से अपनी ही हानि कर रहा है।

5 “हाँ, बुरे जन का प्रकाश बुझेगा

6 उस के तम्बू का प्रकाश काला पड़ जायेगा

7 उस मनुष्य के कदम फिर कभी मजबूत और तेज नहीं होंगे।

8 उसके अपने ही कदम उसे एक जाल के फन्दे में गिरा देंगे।

9 कोई जाल उसकी एड़ी को पकड़ लेगा।

10 एक रस्सा उसके लिये धरती में छिपा होगा।

11 उसके तरफ आतंक उसकी टोह में हैं।

12 भयानक विपत्तियाँ उसके लिये भूखी हैं।

13 महाव्याधि उसके चर्म के भागों को निगल जायेगी।

14 अपने घर की सुरक्षा से दुर्जन को दूर किया जायेगा

15 उसके घर में कुछ भी न बचेगा

16 नीचे गई जड़ें उसकी सूख जायेंगी

17 धरती के लोग उसको याद नहीं करेंगे।

18 प्रकाश से उसको हटा दिया जायेगा और वह अंधकार में ढकेल जायेगा।

19 उसकी कोई सन्तान नहीं होगी अथवा उसके लोगों के कोई वंशज नहीं होंगे।

20 पश्चिम के लोग सहमें रह जायेंगे जब वे सुनेंगे कि उस दुर्जन के साथ क्या घटी।

21 सचमुच दुर्जन के घर के साथ ऐसा ही घटेगा।

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