Jó 17

HIN2010

1 “मेरा मन टूट चुका है।

2 लोग मुझे घेरते हैं और मुझ पर हँसते हैं।

3 “परमेश्वर, मेरे निरपराध होने का शपथ—पत्र मेरा स्वीकार कर।

4 मेरे मित्रों का मन तूने मूँदा अत:

5 लोगों की कहावत को तू जानता है।

6 परमेश्वर ने मेरा नाम हर किसी के लिये अपशब्द बनाया है

7 मेरी आँख लगभग अन्धी हो चुकी है क्योंकि मैं बहुत दु:खी और बहुत पीड़ा में हूँ।

8 मेरी इस दुर्दशा से सज्जन बहुत व्याकुल हैं।

9 किन्तु सज्जन नेकी का जीवन जीते रहेंगे।

10 “किन्तु तुम सभी आओ और फिर मुझ को दिखाने का यत्न करो कि सब दोष मेरा है।

11 मेरा जीवन यूँ ही बात रहा है।

12 किन्तु मेरे मित्र रात को दिन सोचा करते हैं।

13 “यदि मैं आशा करूँ कि अन्धकारपूर्ण कब्र

14 यदि मैं कब्र से कहूँ ‘तू मेरा पिता है’

15 किन्तु यदि वह मेरी एकमात्र आशा है तब तो कोई आशा मुझे नहीं हैं

16 क्या मेरी आशा भी मेरे साथ मृत्यु के द्वार तक जायेगी

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