1 अय्यूब ने कहा,
2 मनुष्य का जीवन एक फूल के समान है
3 हे परमेश्वर, क्या तू मेरे जैसे मनुष्य पर ध्यान देगा
4 “किसी ऐसी वस्तु से जो स्वयं अस्वच्छ है स्वच्छ वस्तु कौन पा सकता है कोई नहीं।
5 मनुष्य का जीवन सीमित है।
6 सो परमेश्वर, तू हम पर आँख रखना छोड़ दे। हम लोगों को अकेला छोड़ दे।
7 “किन्तु यदि वृक्ष को काट गिराया जाये तो भी आशा उसे रहती है कि
8 चाहे उसकी जड़े धरती में पुरानी क्यों न हो जायें
9 किन्तु जल की गंध मात्र से ही वह नई बढ़त देता है
10 किन्तु जब बलशाली मनुष्य मर जाता है
11 जैसे सागर के तट से जल शीघ्र लौट कर खो जाता है
12 उसी तरह जब कोई व्यक्ति मर जाता है
13 “काश! तू मुझे मेरी कब्र में मुझे छुपा लेता
14 यदि कोई मनुष्य मर जाये तो क्या जीवन कभी पायेगा
15 हे परमेश्वर, तू मुझे बुलायेगा
16 फिर तू मेरे हर चरण का जिसे मैं उठाता हूँ, ध्यान रखेगा
17 काश! मेरे पाप दूर हो जाएँ। किसी थैले में उन्हें बन्द कर दिया जाये
18 “जैसे पर्वत गिरा करता है और नष्ट हो जाता है
19 जल पत्थरों के ऊपर से बहता है और उन को घिस डालता है
20 तू एक बार व्यक्ति को हराता है
21 यदि उसके पुत्र कभी सम्मान पाते हैं तो उसे कभी उसका पता नहीं चल पाता।
22 वह मनुष्य अपने शरीर में पीड़ा भोगता है