1 इसके बाद मैंने एक और स्वर्गदूत को आकाश से बड़ी शक्ति के साथ नीचे उतरते देखा। उसकी महिमा से सारी धरती प्रकाशित हो उठी।
2 शक्तिशाली स्वर से पुकारते हुए वह बोला:
3 क्योंकि उसने सब जनों को व्यभिचार के क्रोध की मदिरा पिलायी थी।
4 आकाश से मैंने एक और स्वर सुना जो कह रहा था:
5 क्योंकि उसके पाप की ढेरी बहुत ऊँची गगन तक है।
6 हे! तुम भी तो उससे ठीक वैसा व्यवहार करो जैसा तुम्हारे साथ उसने किया था।
7 क्योंकि जो महिमा और वैभव उसने
8 इसलिए वे नाश जो महामृत्यु,
9 “जब धरती के राजा, जिन्होंने उसके साथ व्यभिचार किया और उसके भोग-विलास में हिस्सा बटाया, उसके जलने से निकलते धुआँ को देखेंगे तो वे उसके लिए रोयेंगे और विलाप करेंगे।
10 वे उसके कष्टों से डर कर वहीं से बहुत दूर ही खड़े हुए कहेंगे:
11 “इस धरती पर के व्यापारी भी उसके कारण रोयेंगे और विलाप करेंगे क्योंकि उनकी वस्तुएँ अब कोई और मोल नहीं लेगा,
12 वस्तुएँ सोने की, चाँदी की, बहुमूल्य रत्न, मोती, मलमल, बैजनी, रेशमी और किरमिजी वस्त्र, हर प्रकार की सुगंधित लकड़ी हाथी दाँत की बनी हुई हर प्रकार की वस्तुएँ, अनमोल लकड़ी, काँसे, लोहे और संगमरमर से बनी हुई तरह-तरह की वस्तुएँ
13 दार चीनी, गुलमेंहदी, सुगंधित धूप, रस गंध, लोहबान, मदिरा, जैतून का तेल, मैदा, गेहूँ, मवेशी, भेड़े, घोड़े और रथ, दास, हाँ, मनुष्यों की देह और उनकी आत्माएँ तक।
14 ‘हे बाबुल! वे सभी उत्तम वस्तुएँ, जिनमें तेरा हृदय रमा था, तुझे सब छोड़ चली गयी हैं
15 “वे व्यापारी जो इन वस्तुओं का व्यापार करते थे और उससे सम्पन्न बन गए थे, वे दूर-दूर ही खड़े रहेंगे क्योंकि वे उसके कष्टों से डर गये हैं। वे रोते-बिलखते
16 कहेंगे:
17 और बस घड़ी भर में यह सारी सम्पत्ति मिट गयी।’
18 और जब उन्होंने उसके जलने से उठती धुआँ को देखा तो वे पुकार उठे, ‘इस विशाल नगरी के समान और कौन सी नगरी है?’
19 फिर उन्होंने अपने सिर पर धूल डालते हुए रोते-बिलखते कहा,
20 उसके हेतु आनन्द मनाओ तुम हे स्वर्ग!
21 फिर एक शक्तिशाली स्वर्गदूत ने चक्की के पाट जैसी एक बड़ी सी चट्टान उठाई और उसे सागर में फेंकते हुए कहा,
22 तुझमें फिर कभी नहीं वीणा बजेगी, और गायक कभी भी स्तुति पाठ न कर पायेंगे।
23 दीप की किंचित किरण तुझमें कभी भी न चमकेगी,
24 नगरी ने नबियों का संत जनों का उन सब ही का लहू बहाया था।