1 हे मोर धरमी परमेसर,
2 हे मनखेमन! तुमन कब तक मोर महिमा के बेजत्ती करत रहिहू?
3 तुमन जान लव कि यहोवा ह अपन बिसवासयोग्य सेवक ला अपन बर अलग रखे हवय;
4 कांपत रहव अऊ पाप झन करव;
5 धरमीपन के बलिदान चघावव
6 बहुंते जन पुछत हवंय, “कोन ह हमर उन्नति करही?”
7 जब ओमन के अनाज अऊ नवां अंगूर के मंद बहुंत होथे,
8 सांति से मेंह लेटहूं अऊ सुतहूं,