1 कोमल जबाब ह गुस्सा ला दूर करथे,
2 बुद्धिमान के बात ह गियान ला बढ़ाथे,
3 यहोवा ह जम्मो कोति देखथे,
4 सांति देवइया बात ह जिनगी के रूख ए,
5 मुरूख ह दाई-ददा के अनुसासन के तिरस्कार करथे,
6 धरमी के घर म बड़े धन रहिथे,
7 बुद्धिमान के मुहूं ले गियान बगरथे,
8 यहोवा ह दुस्ट के बलिदान ले घिन करथे,
9 यहोवा दुस्ट के काम ले घिन करथे,
10 जऊन ह सही रसता ला छोंड़ देथे, ओह कठोर अनुसासन के सामना करथे;
11 मिरतू अऊ बिनास यहोवा के आघू म खुले रहिथें—
12 ठट्ठा करइयामन डांट खाय ले खुस नइं होवंय,
13 मन ह खुस रहे ले चेहरा ह घलो खुस दिखथे,
14 समझदार मनखे ह गियान के खोज म रहिथे,
15 दुखी मनखे के जम्मो दिनमन दुख ले भरे रहिथें,
16 यहोवा के भय के संग थोरकन धन होवई ह
17 मया के घर म थोरकन साग-भाजी के जेवन करई
18 तुरते गुस्सा होवइया मनखे ह झगरा करथे,
19 आलसी मनखे के रसता ह कांटा ले रूंधे रहिथे,
20 बुद्धिमान बेटा ले ददा ह आनंदित होथे,
21 मुरूख ला मुरूखता के बात ले आनंद होथे,
22 बिगर सलाह के योजना ह सफल नइं होवय,
23 सही उत्तर देय म मनखे ला आनंद मिलथे—
24 बुद्धिमान बर जिनगी के रसता ह ऊपर कोति जाथे,
25 यहोवा ह घमंडी के घर ला गिरा देथे,
26 यहोवा ह दुस्ट के सोच-बिचार ले घिन करथे,
27 लालची मनखेमन अपन परिवार के नास करथें,
28 धरमी ह अपन मन म सोच-बिचार करके जबाब देथे,
29 यहोवा ह दुस्ट मनखे ले दूरिहा रहिथे,
30 संदेसिया के आंखी म चमक ह मन ला आनंदित करथे,
31 जऊन ह जिनगी देवइया ताड़ना ऊपर धियान देथे,
32 जऊन मन अनुसासन ला नइं मानंय, ओमन अपनआप ला तुछ समझथें,
33 बुद्धि के निरदेस ह यहोवा के भय मानना ए,