1 यहोवा ह अयूब ला कहिस:
2 “जऊन ह सर्वसक्तिमान ऊपर दोस लगाथे, का ओह ओकर संग बहस करही?
3 तब अयूब ह यहोवा ला जबाब दीस:
4 “मेंह तो तुछ मनखे अंव—मेंह तोला कइसे जबाब दे सकत हंव?
5 एक बार मेंह गोठिया डारेंव, पर मोर करा जबाब नइं ए—
6 तब यहोवा ह अयूब ला गरेर म ले गोठियाईस:
7 “एक आदमी कस अपन कनिहां कस ले;
8 “का तेंह मोर नियाय ला बेकार ठहिराबे?
9 का तोर करा परमेसर के सहीं भुजबल हवय,
10 तब तेंह अपनआप ला महिमा अऊ परताप ले संवार ले,
11 अपन उफनत रिस ला छोंड़ दे,
12 जऊन मन घमंडी अंय, ओमन ला देख अऊ ओमन ला नम्र बना,
13 ओ जम्मो झन ला एके संग माटी म गाड़ दे;
14 तब मेंह खुद मान लूहूं
15 “जलहाथी ला देख,
16 ओकर कनिहां म कतेक बल होथे,
17 ओकर पुंछी ह देवदार रूख कस झुमथे;
18 ओकर हाड़ामन कांस के नलीमन कस अंय,
19 परमेसर के रचना म ओह पहिला जगह पाथे,
20 पठारमन ले ओकर बर चारा मिलथे,
21 ओह कमल फूल के नार के तरी म लेटथे,
22 कमल फूल के नारमन ओला अपन छइहां म छुपाथें,
23 नदी म घुमड़त बाढ़ आय ले घलो ओह नइं घबरावय;
24 का कोनो ओला पकड़ सकथे जब ओह जागत रहिथे,