1 “इही बात म मोर हिरदय ह कांपथे
2 सुन! परमेसर के अवाज के गरजन,
3 ओह अपन बिजली ला जम्मो अकास के खाल्हे जावन देथे
4 ओकर बाद ओकर गरजन के अवाज आथे;
5 परमेसर के अवाज ह अद्भूत रीति ले गरजथे;
6 ओह बरफ ला हुकूम देथे, ‘धरती म गिर,’
7 ताकि हर एक मनखे, जऊन ला ओह बनाय हे, ओकर काम ला जानय,
8 तब बन के पसुमन अपन गुफा म खुसर जाथें;
9 अपन छेत्र ले आंधी,
10 परमेसर के सांस फूंके ले बरफ बनथे,
11 ओह बादरमन ला नमी ले लादथे;
12 ओकर आदेस म येमन
13 ओह मनखेमन ला दंड देय बर बादर लानथे,
14 “हे अयूब, येला सुन;
15 का तें जानथस कि परमेसर ह कइसे बादरमन ला अपन हुकूम ले चलाथे
16 का तेंह जानथस कि बादरमन अधर म कइसे रहिथें,
17 जब दक्खिन के हवा के कारन भुइयां ह सांत रहिथे,
18 त का तेंह ओकर संग म अकास-मंडल ला तान सकत हस,
19 “हमन ला बता कि हमन ओला का कहिबो;
20 का ओला बताय जावय कि मेंह गोठियाय चाहत हंव?
21 अभी तो सूरज कोति कोनो नइं देख सकंय,
22 उत्तर कोति ले ओह सोन कस चमकत आथे;
23 सर्वसक्तिमान ह हमर पहुंच के बाहिर ए अऊ बहुंत सामर्थी ए;
24 एकरसेति, मनखेमन ओकर आदर करंय,