1 तब तेमान के रहइया एलीपज ह जबाब दीस:
2 “का बुद्धिमान मनखे बिगर सोचे-बिचारे जबाब दीही
3 का ओमन बेकार के गोठ ले बहस करहीं
4 पर तेंह परमेसर के आदर ला कम करथस
5 तोर पाप ह तोर मुहूं ला गोठियाय बर उकसावत हे;
6 मेंह नइं, पर तोर खुद के मुहूं के गोठ ह तोला दोसी ठहिरात हे;
7 “का जम्मो मनखे म सबले पहिली तेंह जनमे?
8 का तें परमेसर के सभा म बईठके सुनथस?
9 तेंह अइसे का जानथस, जऊन ला हमन नइं जानन?
10 पाके चुंदीवाला अऊ सियानमन हमर तरफ हवंय,
11 का परमेसर के ढाढ़स देवई,
12 तोर मन ह तोला काबर आने कोति लेगत हे,
13 कि तेंह अपन गुस्सा ला परमेसर के बिरोध म परगट कर
14 “मरनहार मनखे ह का अय कि ओह सुध हो सकय
15 यदि परमेसर ह अपन पबितर मनखेमन ऊपर भरोसा नइं करय,
16 त फेर मरनहार मनखेमन के का हिसाब, जऊन मन दुस्ट अऊ भ्रस्ट अंय,
17 “मोर बात ला सुन अऊ मेंह तोला समझाहूं;
18 ओ बात जऊन ला बुद्धिमान मनखेमन अपन पुरखामन ले पाय रिहिन,
19 (सिरिप पुरखामन ला देस दिये गे रिहिस
20 दुस्ट मनखे ह अपन जिनगी भर पीरा सहथे,
21 भयभीत करइया अवाज ओकर कान म गूंजत रहिथे;
22 ओला अंधियार म ले बच निकले के बिसवास नइं रहय;
23 ओह गिधवा के सहीं जेवन बर एती-ओती किंदरत रहिथे;
24 पीरा अऊ बिपत्ति के भय ले ओह भरे रहिथे;
25 काबरकि ओह परमेसर के ऊपर मुक्का तानथे
26 अऊ ओकर बिरोध म उतावला होके
27 “हालाकि ओकर चेहरा म चरबी बड़ गे हवय
28 पर ओह उजरे नगरमन म अऊ ओ घरमन म रहिही
29 ओह अऊ धनवान नइं रहिही अऊ ओकर धन बने नइं रहय,
30 ओह अंधियार ले नइं बांच पाही;
31 ओह बेकार के बातमन म भरोसा करके अपनआप ला धोखा झन देवय,
32 अपन समय के पहिली ओह मुरझा जाही,
33 ओह ओ अंगूर के नार सहीं होही जेकर कइंचा अंगूरमन झरके गिर जाथें,
34 काबरकि भक्तिहीन के संगति म रहइया बिगर फर के होही,
35 ओमन समस्या खड़े करे के योजना बनाथें अऊ दुस्ट काम करथें;