1 प्रभु, समस्त पीढ़ियों में
2 इसके पूर्व कि पर्वत अस्तित्व में आते
3 आप मनुष्य को यह कहकर पुनः धूल में लौटा देते हैं,
4 आपके लिए एक हजार वर्ष वैसे ही होते हैं,
5 आप मनुष्यों को ऐसे समेट ले जाते हैं, जैसे बाढ़; वे स्वप्न मात्र होते हैं—
6 जो प्रातःकाल फूलती है, उसमें बढ़ती है,
7 आपका कोप हमें मिटा डालता है,
8 हमारे अपराध आपके सामने खुले हैं,
9 हमारे जीवन के दिन आपके क्रोध की छाया में ही व्यतीत होते हैं;
10 हमारी जीवन अवधि सत्तर वर्ष है—संभवतः
11 आपके कोप की शक्ति की जानकारी कौन ले सका है!
12 हमें जीवन की न्यूनता की धर्ममय विवेचना करने की अंतर्दृष्टि प्रदान कीजिए,
13 याहवेह! मृदु हो जाइए, और कितना विलंब?
14 प्रातःकाल में ही हमें अपने करुणा-प्रेम से संतुष्ट कर दीजिए,
15 हमारे उतने ही दिनों को आनंद से तृप्त कर दीजिए, जितने दिन आपने हमें ताड़ना दी थी,
16 आपके सेवकों के सामने आपके महाकार्य स्पष्ट हो जाएं
17 हम पर प्रभु, हमारे परमेश्वर की मनोहरता स्थिर रहे;