1 स्वर्ग परमेश्वर की महिमा को प्रगट करता है;
2 हर एक दिन आगामी दिन से इस विषय में वार्तालाप करता है;
3 इस प्रक्रिया में न तो कोई बोली है, न ही कोई शब्द;
4 इनका स्वर संपूर्ण पृथ्वी पर गूंजता रहता है,
5 और सूर्य एक वर के समान है, जो अपने मंडप से बाहर आ रहा है,
6 वह आकाश के एक सिरे से उदय होता है,
7 संपूर्ण है याहवेह की व्यवस्था,
8 धर्ममय हैं याहवेह के नीति सूत्र,
9 निर्मल है याहवेह की श्रद्धा,
10 वे स्वर्ण से भी अधिक मूल्यवान हैं,
11 इन्हीं के द्वारा आपके सेवक को चेतावनी मिलती हैं;
12 अपनी भूल-चूक का ज्ञान किसे होता है?
13 अपने सेवक को ढिठाई के पाप करने से रोके रहिए;
14 याहवेह, मेरी चट्टान और मेरे उद्धारक,