1 याहवेह, मेरी प्रार्थना सुनिए;
2 मेरी पीड़ा के समय मुझसे अपना मुखमंडल छिपा न लीजिए.
3 धुएं के समान मेरा समय विलीन होता जा रहा है;
4 घास के समान मेरा हृदय झुलस कर मुरझा गया है;
5 मेरी सतत कराहटों ने मुझे मात्र हड्डियों
6 मैं वन के उल्लू समान होकर रह गया हूं,
7 मैं सो नहीं पाता,
8 दिन भर मैं शत्रुओं के ताने सुनता रहता हूं;
9 राख ही अब मेरा आहार हो गई है
10 यह सब आपके क्रोध,
11 मेरे दिन अब ढलती छाया-समान हो गए हैं;
12 किंतु, याहवेह, आप सदा-सर्वदा सिंहासन पर विराजमान हैं;
13 आप उठेंगे और ज़ियोन पर मनोहरता करेंगे,
14 इस नगर का पत्थर-पत्थर आपके सेवकों को प्रिय है;
15 समस्त राष्ट्रों पर आपके नाम का आतंक छा जाएगा,
16 क्योंकि याहवेह ने ज़ियोन का पुनर्निर्माण किया है;
17 याहवेह लाचार की प्रार्थना का प्रत्युत्तर देते हैं;
18 भावी पीढ़ी के हित में यह लिखा जाए,
19 “याहवेह ने अपने महान मंदिर से नीचे की ओर दृष्टि की,
20 कि वह बंदियों का कराहना सुनें और उन्हें मुक्त कर दें,
21 कि मनुष्य ज़ियोन में याहवेह की महिमा की घोषणा कर सकें
22 जब लोग तथा राज्य
23 मेरी जीवन यात्रा पूर्ण भी न हुई थी, कि उन्होंने मेरा बल शून्य कर दिया;
24 तब मैंने आग्रह किया:
25 प्रभु, आपने प्रारंभ में ही पृथ्वी की नींव रखी,
26 वे तो नष्ट हो जाएंगे किंतु आप अस्तित्व में ही रहेंगे;
27 आप न बदलनेवाले हैं,
28 आपके सेवकों की सन्तति आपकी उपस्थिति में निवास करेंगी;