1 ज्ञान ने एक घर का निर्माण किया है;
2 उसने उत्कृष्ट भोजन तैयार किए हैं तथा उत्तम द्राक्षारस भी परोसा है;
3 आमंत्रण के लिए उसने अपनी सहेलियां भेज दी हैं
4 “जो कोई सरल-साधारण है, यहां आ जाए!”
5 “आ जाओ, मेरे भोज में सम्मिलित हो जाओ.
6 अपना भोला चालचलन छोड़कर;
7 यदि कोई ठट्ठा करनेवाले की भूल सुधारता है, उसे अपशब्द ही सुनने पड़ते हैं;
8 तब ठट्ठा करनेवाले को मत डांटो, अन्यथा तुम उसकी घृणा के पात्र हो जाओगे;
9 शिक्षा ज्ञानवान को दो. इससे वह और भी अधिक ज्ञानवान हो जाएगा;
10 याहवेह के प्रति श्रद्धा-भय से ज्ञान का
11 तुम मेरे द्वारा ही आयुष्मान होगे
12 यदि तुम बुद्धिमान हो, तो तुम्हारा ज्ञान तुमको प्रतिफल देगा;
13 श्रीमती मूर्खता उच्च स्वर में बक-बक करती है;
14 उसके घर के द्वार पर ही अपना आसन लगाया है,
15 वह उनको आह्वान करती है, जो वहां से निकलते हैं,
16 “जो कोई सीधा-सादा है, वह यहां आ जाए!”
17 “मीठा लगता है चोरी किया हुआ जल;
18 भला उसे क्या मालूम कि वह मृतकों का स्थान है,