1 याकेह के पुत्र आगूर का वक्तव्य—एक प्रकाशन ईथिएल के लिए.
2 निःसंदेह, मैं इन्सान नहीं, जानवर जैसा हूं;
3 न तो मैं ज्ञान प्राप्त कर सका हूं,
4 कौन है, जो स्वर्ग में चढ़कर फिर उतर आया है?
5 “परमेश्वर का हर एक वचन प्रामाणिक एवं सत्य है;
6 उनके वक्तव्य में कुछ भी न जोड़ा जाए ऐसा न हो कि तुम्हें उनकी फटकार सुननी पड़े और तुम झूठ प्रमाणित हो जाओ.
7 “अपनी मृत्यु के पूर्व मैं आपसे दो आग्रह कर रहा हूं;
8 मुझसे वह सब अत्यंत दूर कर दीजिए, जो झूठ है, असत्य है;
9 ऐसा न हो कि सम्पन्नता में मैं आपका त्याग ही कर दूं
10 “किसी सेवक के विरुद्ध उसके स्वामी के कान न भरना,
11 “एक पीढ़ी ऐसी है, जो अपने ही पिता को शाप देती है,
12 कुछ की दृष्टि में उनका अपना चालचलन शुद्ध होता है
13 एक और समूह ऐसा है,
14 कुछ वे हैं, जिनके दांत तलवार समान
15 “जोंक की दो बेटियां हैं.
16 अधोलोक तथा
17 “वह नेत्र, जो अपने पिता का अनादर करते हैं,
18 “तीन वस्तुएं मेरे लिए अत्यंत विस्मयकारी हैं,
19 आकाश में गरुड़ की उड़ान,
20 “व्यभिचारिणी स्त्री की चाल यह होती है:
21 “तीन परिस्थितियां ऐसी हैं, जिनमें पृथ्वी तक कांप उठती है;
22 दास का राजा बन जाना,
23 पूर्णतः घिनौनी स्त्री का विवाह हो जाना
24 “पृथ्वी पर चार प्राणी ऐसे हैं, जो आकार में तो छोटे हैं,
25 चीटियों की गणना सशक्त प्राणियों में नहीं की जाती,
26 चट्टानों के निवासी बिज्जू सशक्त प्राणी नहीं होते,
27 अरबेह टिड्डियों का कोई शासक नहीं होता,
28 छिपकली, जो हाथ से पकड़े जाने योग्य लघु प्राणी है,
29 “तीन हैं, जिनके चलने की शैली अत्यंत भव्य है,
30 सिंह, जो सभी प्राणियों में सबसे अधिक शक्तिमान है, वह किसी के कारण पीछे नहीं हटता;
31 गर्वीली चाल चलता हुआ मुर्ग,
32 “यदि तुम आत्मप्रशंसा की मूर्खता कर बैठे हो,
33 जिस प्रकार दूध के मंथन से मक्खन तैयार होता है,