1 भावी कल तुम्हारे गर्व का विषय न हो,
2 कोई अन्य तुम्हारी प्रशंसा करे तो करे, तुम स्वयं न करना;
3 पत्थर भारी होता है और रेत का भी बोझ होता है,
4 कोप में क्रूरता निहित होती है तथा रोष में बाढ़ के समान उग्रता,
5 छिपे प्रेम से कहीं अधिक प्रभावशाली है
6 मित्र द्वारा किए गए घाव भी विश्वासयोग्य है,
7 जब भूख अच्छी रीति से तृप्त की जा चुकी है, तब मधु भी अप्रिय लगने लगता है,
8 अपने घर से दूर चला गया व्यक्ति वैसा ही होता है
9 तेल और सुगंध द्रव्य हृदय को मनोहर कर देते हैं,
10 अपने मित्र तथा अपने माता-पिता के मित्र की उपेक्षा न करना.
11 मेरे पुत्र, कैसा मनोहर होगा मेरा हृदय, जब तुम स्वयं को बुद्धिमान प्रमाणित करोगे;
12 चतुर व्यक्ति जोखिम को देखकर छिप जाता है,
13 जो किसी अनजान के ऋण की ज़मानत देता है, वह अपने वस्त्र तक गंवा बैठता है;
14 यदि किसी व्यक्ति को प्रातःकाल में अपने पड़ोसी को उच्च स्वर में आशीर्वाद देता हुआ सुनो,
15 विवादी पत्नी तथा वर्षा ऋतु में लगातार वृष्टि,
16 उसे नियंत्रित करने का प्रयास पवन वेग को नियंत्रित करने का प्रयास जैसा,
17 जिस प्रकार लोहे से ही लोहे पर धार बनाया जाता है,
18 अंजीर का फल वही खाता है, जो उस वृक्ष की देखभाल करता है,
19 जिस प्रकार जल में मुखमंडल की छाया देख सकते हैं,
20 मृत्यु और विनाश अब तक संतुष्ट नहीं हुए हैं,
21 चांदी की परख कुठाली से तथा स्वर्ण की भट्टी से होती है,
22 यदि तुम मूर्ख को ओखली में डालकर
23 अनिवार्य है कि तुम्हें अपने पशुओं की स्थिति का यथोचित ज्ञान हो,
24 क्योंकि, न तो धन-संपत्ति चिरकालीन होती है,
25 जब सूखी घास एकत्र की जा चुकी हो और नई घास अंकुरित हो रही हो,
26 तब मेमनों से तुम्हारे वस्त्रों की आवश्यकता की पूर्ति होगी,
27 बकरियों के दूध इतना भरपूर होगा कि वह तुम्हारे संपूर्ण परिवार के लिए पर्याप्त भोजन रहेगा;