1 तब शूही बिलदद ने कहना प्रारंभ किया:
2 “और कितना दोहराओगे इस विषय को?
3 क्या परमेश्वर द्वारा अन्याय संभव है?
4 यदि तुम्हारे पुत्रों ने परमेश्वर के विरुद्ध पाप किया है,
5 यदि तुम परमेश्वर को आग्रहपूर्वक अर्थना करें, सर्वशक्तिमान से
6 यदि तुम पापरहित तथा ईमानदार हो, यह निश्चित है
7 यद्यपि तुम्हारा प्रारंभ नम्र जान पड़ेगा,
8 “कृपा करो और पूर्व पीढ़ियों से मालूम करो,
9 क्योंकि हम तो कल की पीढ़ी हैं और हमें इसका कोई ज्ञान नहीं है,
10 क्या वे तुम्हें शिक्षा देते हुए प्रकट न करेंगे,
11 क्या दलदल में कभी सरकंडा उग सकता है?
12 वह हरा ही होता है तथा इसे काटा नहीं जाता,
13 उनकी चालचलन भी ऐसी होती है, जो परमेश्वर को भूल जाते हैं;
14 उसका आत्मविश्वास दुर्बल होता है
15 उसने अपने घर के आश्रय पर भरोसा किया, किंतु वह स्थिर न रह सका है;
16 वह सूर्य प्रकाश में समृद्ध हो जाता है,
17 उसकी जड़ें पत्थरों को चारों ओर से जकड़ लेती हैं,
18 यदि उसे उसके स्थान से उखाड़ दिया जाए,
19 अय्योब, ध्यान दो! यही है परमेश्वर की नीतियों का आनंद;
20 “मालूम है कि परमेश्वर सत्यनिष्ठ व्यक्ति को उपेक्षित नहीं छोड़ देते,
21 अब भी वह तुम्हारे जीवन को हास्य से पूर्ण कर देंगे,
22 जिन्हें तुमसे घृणा है, लज्जा उनका परिधान होगी