1 तब अय्योब ने उत्तर दिया:
2 “निःसंदेह तुम्हीं हो वे लोग,
3 किंतु तुम्हारे समान बुद्धि मुझमें भी है;
4 “अपने मित्रों के लिए तो मैं हंसी मज़ाक का विषय होकर रह गया हूं,
5 सुखी धनवान व्यक्ति को दुःखी व्यक्ति घृणित लग रहा है.
6 उन्हीं के घरों को सुरक्षित छोड़ा जा रहा है, जो हिंसक-विनाशक हैं,
7 “किंतु अब जाकर पशुओं से परामर्श लो, अब वे तुम्हें शिक्षा देने लगें,
8 अन्यथा पृथ्वी से ही वार्तालाप करो, वही तुम्हें शिक्षा दे,
9 कौन है तुम्हारे मध्य जो इस सत्य से अनजान है,
10 किसका अधिकार है हर एक जीवधारी जीवन पर
11 क्या कान शब्दों की परख नहीं करता,
12 क्या, वृद्धों में बुद्धि पायी नहीं जाती है?
13 “विवेक एवं बल परमेश्वर के साथ हैं;
14 जो कुछ उनके द्वारा गिरा दिया जाता है, उसे फिर से बनाया नहीं जा सकता;
15 सुनो! क्या कहीं सूखा पड़ा है? यह इसलिये कि परमेश्वर ने ही जल रोक कर रखा है;
16 वही हैं बल एवं ज्ञान के स्रोत;
17 वह मंत्रियों को विवस्त्र कर छोड़ते हैं
18 वह राजाओं द्वारा डाली गई बेड़ियों को तोड़ फेंकते हैं
19 वह पुरोहितों को नग्न पांव चलने के लिए मजबूर कर देते हैं
20 वह विश्वास सलाहकारों को अवाक बना देते हैं
21 वह आदरणीय व्यक्ति को घृणा के पात्र बना छोड़ते हैं.
22 वह घोर अंधकार में बड़े रहस्य प्रकट कर देते हैं,
23 वही राष्ट्रों को उन्नत करते और फिर उन्हें नष्ट भी कर देते हैं.
24 वह विश्व के शासकों की बुद्धि शून्य कर देते हैं
25 वे घोर अंधकार में टटोलते रह जाते हैं