1 आकाशमंडल, यहां ध्यान दो, मुझे सम्भाषण का अवसर प्रदान करो;
2 मेरी शिक्षा वृष्टि-समान टपके,
3 क्योंकि मेरी घोषणा है याहवेह के सम्मान;
4 वह चट्टान! त्रुटिहीन है उनकी रचना,
5 याहवेह के प्रति उनका पालन विकृत रहा है,
6 ओ मूर्खो, और मन्दमति लोगो,
7 अतीत के उन दिनों का स्मरण करो;
8 जब सर्वोच्च ने राष्ट्रों में उनकी मीरास आवंटित की,
9 क्योंकि याहवेह की संपदा है उनकी प्रजा;
10 एक मरुभूमि में उनकी उससे भेंट हुई, वस्तुतः
11 उस गरुड़-समान, जो अपने नीड़ को हिला कर अपने बच्चों को जगाता,
12 सिर्फ याहवेह ही उसके दिग्दर्शक थे;
13 याहवेह ने उसे अपने देश के ऊंचे क्षेत्रों में विचरण करने योग्य बना दिया था.
14 गाय-दुग्ध-दही,
15 मगर यशुरून स्वस्थ होकर उद्दंड हो गया;
16 विदेशी देवताओं के द्वारा उन्होंने याहवेह को ईर्ष्यालु बना दिया,
17 उन्होंने प्रेत आत्माओं को बलि अर्पित की, जो परमेश्वर ही नहीं होती.
18 तुमने उस चट्टान की उपेक्षा की,
19 यह सब याहवेह की दृष्टि में आ गया और उन्हें उनसे घृणा हो गई,
20 तब याहवेह ने कहा, “मैं उनसे अपना मुख छिपा लूंगा,
21 उन्होंने मुझे उसके द्वारा ईर्ष्यालु बना दिया, जो ईश्वर है ही नहीं;
22 क्योंकि मेरी क्रोध की अग्नि प्रज्वलित हो चुकी है,
23 “उन पर तो मैं विपत्तियों के ढेर लगा दूंगा
24 वे दुर्भिक्ष के प्रभाव से नाश हो जाएंगे,
25 घर के बाहर तलवार द्वारा निर्वंश किए जाएंगे;
26 मैं कह सकता था, मैं उन्हें काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दूंगा,
27 यदि मुझे शत्रु की ओर से उत्तेजना का भय न होता,
28 क्योंकि वे ऐसे राष्ट्र हैं, जिसमें बुद्धि का नितांत अभाव है,
29 यदि उनमें बुद्धिमता होती वे यह समझ लेते,
30 भला यह कैसे संभव हो सकता है, कि सिर्फ एक व्यक्ति एक सहस्र को खदेड़ दे,
31 बात यह है कि उनकी चट्टान हमारी चट्टान के तुल्य नहीं है,
32 उनकी द्राक्षालता का मूल है सोदोम की द्राक्षालता
33 क्योंकि उनका द्राक्षारस सर्पों का विष है,
34 “क्या यह सब मेरे भंडार में संग्रहीत नहीं है;
35 प्रतिशोध मेरा दायित्व है; प्रतिदण्ड मैं दूंगा.
36 क्योंकि जब याहवेह यह देखेंगे कि उनकी प्रजा की शक्ति का ह्रास हो चुका है,
37 याहवेह प्रश्न करेंगे: “कहां हैं उनके देवता;
38 वे देवता, जो उनकी बलियों की वसा का सेवन करते रहे थे,
39 “ध्यान से देख लो कि मैं ही याहवेह हूं,
40 मैं ही हूं, जो स्वर्ग की ओर अपना हाथ बढ़ाकर यह कहता हूं:
41 जब मैं अपने शत्रुओं से प्रतिशोध लूंगा,
42 मैं अपने बाणों को रक्त से मदमस्त कर दूंगा,
43 राष्ट्रों, याहवेह की प्रजा के साथ उल्लास मनाओ,
44 इसके बाद मोशेह ने जाकर सारी इस्राएली प्रजा के सामने उन्हें सुनाते हुए इस गीत रचना का पठन किया; उन्होंने और उनके साथ नून के पुत्र होशिया (यहोशू) ने.
45 जब मोशेह सारी इस्राएलियों के सामने समग्र गीत का पाठन कर चुके,
46 उन्होंने इस्राएलियों को आदेश दिया, “इन शब्दों को तुम हृदय में रख लो. ये मैं तुम्हें चेतावनी स्वरूप सौंप रहा हूं. तुम अपनी सन्तति को इन्हें सावधानीपूर्वक पालन करने का आदेश दोगे; इस विधान का पूरी तरह पालन करने का.
47 क्योंकि यह कोई निरर्थक वक्तव्य नहीं है. वस्तुतः यही तुम्हारे जीवन है. इसी के मर्म के द्वारा उस देश में तुम अपने जीवन के दिनों का आवर्धन करोगे, जिसमें तुम यरदन पार करके प्रवेश करने पर हो, जिसका तुम अधिग्रहण करोगे.”
48 उसी दिन याहवेह ने मोशेह को यह आदेश दिया,
49 “अब तुम अबारिम के नेबो पर्वत पर चढ़ जाओ, जो येरीख़ो के सम्मुख मोआब देश में है. वहां जाकर तुम कनान देश पर दृष्टिपात करो, जो मैं अभिग्रहण के लिए इस्राएल को प्रदान कर रहा हूं.
50 तब तुम जिस पर्वत पर चढ़ोगे, वहीं अपने प्राण विसर्जित कर देना और अपने पूर्वजों में सम्मिलित हो जाना, जिस प्रकार तुम्हारे भाई अहरोन ने होर पर्वत पर जा अपने प्राण विसर्जित किए थे, और वह अपने पूर्वजों में सम्मिलित हो गया.
51 क्योंकि तुमने समस्त इस्राएलियों के बीच में मेरिबाह-कादेश के जल-स्रोतों पर ज़िन के निर्जन प्रदेश में मेरे साथ विश्वासघात किया, इस्राएलियों के बीच में मेरे लिए उपयुक्त पवित्रता का व्यवहार नहीं किया.
52 तुम दूर ही से उस देश का दर्शन कर सकोगे; मगर उसमें प्रवेश नहीं करोगे, उस देश में, जो मैं इस्राएलियों को प्रदान कर रहा हूं.”