1 हे मेरे पुत्र, मेरी बातों को माना कर,
2 मेरी आज्ञाओं को मान, इससे तू जीवित रहेगा,
3 उनको अपनी उँगलियों में बाँध,
4 बुद्धि से कह, “तू मेरी बहन है,”
5 तब तू पराई स्त्री से बचेगा,
6 मैंने एक दिन अपने घर की खिड़की से,
7 तब मैंने भोले लोगों में से
8 वह उस स्त्री के घर के कोने के पास की सड़क से गुजर रहा था,
9 उस समय दिन ढल गया, और संध्याकाल आ गया था,
10 और उससे एक स्त्री मिली,
11 वह शान्ति रहित और चंचल थी,
12 कभी वह सड़क में, कभी चौक में पाई जाती थी,
13 तब उसने उस जवान को पकड़कर चूमा,
14 “मैंने आज ही मेलबलि चढ़ाया
15 इसी कारण मैं तुझ से भेंट करने को निकली,
16 मैंने अपने पलंग के बिछौने पर
17 मैंने अपने बिछौने पर गन्धरस,
18 इसलिए अब चल हम प्रेम से भोर तक जी बहलाते रहें;
19 क्योंकि मेरा पति घर में नहीं है;
20 वह चाँदी की थैली ले गया है;
21 ऐसी ही लुभानेवाली बातें कह कहकर, उसने उसको फँसा लिया;
22 वह तुरन्त उसके पीछे हो लिया,
23 अन्त में उस जवान का कलेजा तीर से बेधा जाएगा;
24 अब हे मेरे पुत्रों, मेरी सुनो,
25 तेरा मन ऐसी स्त्री के मार्ग की ओर न फिरे,
26 क्योंकि बहुत से लोग उसके द्वारा मारे गए है;
27 उसका घर अधोलोक का मार्ग है,