1 तब अय्यूब ने कहा,
2 “मेरी कुड़कुड़ाहट अब भी नहीं रुक सकती,
3 भला होता, कि मैं जानता कि वह कहाँ मिल सकता है,
4 मैं उसके सामने अपना मुकद्दमा पेश करता,
5 मैं जान लेता कि वह मुझसे उत्तर में क्या कह सकता है,
6 क्या वह अपना बड़ा बल दिखाकर मुझसे मुकद्दमा लड़ता?
7 सज्जन उससे विवाद कर सकते,
8 “देखो, मैं आगे जाता हूँ परन्तु वह नहीं मिलता;
9 जब वह बाईं ओर काम करता है तब वह मुझे दिखाई नहीं देता;
10 परन्तु वह जानता है, कि मैं कैसी चाल चला हूँ;
11 मेरे पैर उसके मार्गों में स्थिर रहे;
12 उसकी आज्ञा का पालन करने से मैं न हटा,
13 परन्तु वह एक ही बात पर अड़ा रहता है,
14 जो कुछ मेरे लिये उसने ठाना है,
15 इस कारण मैं उसके सम्मुख घबरा जाता हूँ;
16 क्योंकि मेरा मन परमेश्वर ही ने कच्चा कर दिया,
17 क्योंकि मैं अंधकार से घिरा हुआ हूँ,