Jó 14

HIN2017

1 “मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्न होता है,

2 वह फूल के समान खिलता, फिर तोड़ा जाता है;

3 फिर क्या तू ऐसे पर दृष्टि लगाता है?

4 अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है?

5 मनुष्य के दिन नियुक्त किए गए हैं,

6 इस कारण उससे अपना मुँह फेर ले, कि वह आराम करे,

7 “वृक्ष के लिये तो आशा रहती है,

8 चाहे उसकी जड़ भूमि में पुरानी भी हो जाए,

9 तो भी वर्षा की गन्ध पाकर वह फिर पनपेगा,

10 परन्तु मनुष्य मर जाता, और पड़ा रहता है;

11 जैसे नदी का जल घट जाता है,

12 वैसे ही मनुष्य लेट जाता और फिर नहीं उठता;

13 भला होता कि तू मुझे अधोलोक में छिपा लेता,

14 यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा?

15 तू मुझे पुकारता, और मैं उत्तर देता हूँ;

16 परन्तु अब तू मेरे पग-पग को गिनता है,

17 मेरे अपराध छाप लगी हुई थैली में हैं,

18 “और निश्चय पहाड़ भी गिरते-गिरते नाश हो जाता है,

19 और पत्थर जल से घिस जाते हैं,

20 तू सदा उस पर प्रबल होता, और वह जाता रहता है;

21 उसके पुत्रों की बड़ाई होती है, और यह उसे नहीं सूझता;

22 केवल उसकी अपनी देह को दुःख होता है;

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