1 “मनुष्य जो स्त्री से उत्पन्न होता है,
2 वह फूल के समान खिलता, फिर तोड़ा जाता है;
3 फिर क्या तू ऐसे पर दृष्टि लगाता है?
4 अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है?
5 मनुष्य के दिन नियुक्त किए गए हैं,
6 इस कारण उससे अपना मुँह फेर ले, कि वह आराम करे,
7 “वृक्ष के लिये तो आशा रहती है,
8 चाहे उसकी जड़ भूमि में पुरानी भी हो जाए,
9 तो भी वर्षा की गन्ध पाकर वह फिर पनपेगा,
10 परन्तु मनुष्य मर जाता, और पड़ा रहता है;
11 जैसे नदी का जल घट जाता है,
12 वैसे ही मनुष्य लेट जाता और फिर नहीं उठता;
13 भला होता कि तू मुझे अधोलोक में छिपा लेता,
14 यदि मनुष्य मर जाए तो क्या वह फिर जीवित होगा?
15 तू मुझे पुकारता, और मैं उत्तर देता हूँ;
16 परन्तु अब तू मेरे पग-पग को गिनता है,
17 मेरे अपराध छाप लगी हुई थैली में हैं,
18 “और निश्चय पहाड़ भी गिरते-गिरते नाश हो जाता है,
19 और पत्थर जल से घिस जाते हैं,
20 तू सदा उस पर प्रबल होता, और वह जाता रहता है;
21 उसके पुत्रों की बड़ाई होती है, और यह उसे नहीं सूझता;
22 केवल उसकी अपनी देह को दुःख होता है;