1 मैं अपने सम्पूर्ण मन से यहोवा की स्तुति करता हूँ।
2 तूने ही मुझे इतना आनन्दित बनाया है।
3 जब मेरे शत्रु मुझसे पलट कर मेरे विमुख होते हैं,
4 तू सच्चा न्यायकर्ता है। तू अपने सिंहासन पर न्यायकर्ता के रुप में विराजा।
5 हे यहोवा, तूने उन शत्रुओं को कठोर झिड़की दी
6 शत्रु नष्ट हो गया है!
7 किन्तु यहोवा, तेरा शासन अविनाशी है।
8 यहोवा धरती के सब मनुष्यों का निष्पक्ष होकर न्याय करता है।
9 यहोवा दलितों और शोषितों का शरणस्थल है।
10 जो तुझ पर भरोसा रखते,
11 अरे ओ सिय्योन के निवासियों, यहोवा के गीत गाओ जो सिय्योन में विराजता है।
12 जो लोग यहोवा से न्याय माँगने गये,
13 यहोवा की स्तुति मैंने गायी है: “हे यहोवा, मुझ पर दया कर।
14 जिससे यहोवा यरूशलेम के फाटक पर मैं तेरी स्तुति गीत गा सकूँ।
15 अन्य जातियों ने गके खोदे ताकि लोग उनमें गिर जायें किन्तु वे अपने ही खोदे गके में स्वयं समा जायेंगे। दुष्ट जन ने जाल छिपा छिपा कर बिछाया, ताकि वे उसमें दूसरे लोगों को फँसा ले।
16 यहोवा ने जो न्याय किया वह उससे जाना गया कि जो बुरे कर्म करते हैं,
17 वे दुर्जन होते हैं, जो परमेश्वर को भूलते हैं।
18 कभी—कभी लगता है जैसे परमेश्वर दुखियों को पीड़ा में भूल जाता है।
19 हे यहोवा, उठ और राष्रों का न्याय कर।
20 लोगों को पाठ सिखा दे,