1 क्या सुबुद्धि तुझको पुकारती नहीं है
2 वह राह के किनारे ऊँचे स्थानों पर खड़ी रहती है
3 वह नगर को जाने वाले द्वारों के सहारे
4 “हे लोगों, मैं तुमको पुकारती हूँ,
5 अरे भोले लोगों! दूर दृष्टि प्राप्त करो,
6 सुनो! क्योंकि मेरे पास कहने को उत्तम बातें है,
7 मेरे मुख से तो वही निकलता है जो सत्य है,
8 मेरे मुख के सभी शब्द न्यायपूर्ण होते है
9 विचारशील जन के लिये
10 चाँदी नहीं बल्कि तू मेरी शिक्षा ग्रहण कर
11 सुबुद्धि, रत्नों, मणि माणिकों से अधिक मूल्यवान है।
12 “मैं सुबुद्धि,
13 यहोवा का डरना, पाप से घृणा करना है।
14 मेरे परामर्श और न्याय उचित होते हैं।
15 मेरे ही साहारे राजा राज्य करते हैं,
16 मेरी ही सहायता से धरती के सब महानुभाव शासक राज चलाते हैं।
17 जो मुझसे प्रेम करते हैं, मैं भी उन्हें प्रेम करतीहूँ,
18 सम्पत्तियाँ और आदर मेरे साथ हैं।
19 मेरा फल स्वर्ण से उत्तम है।
20 मैं न्याय के मार्ग के सहारे
21 मुझसे जो प्रेम करते उन्हें मैं धन देती हूँ,
22 “यहोवा ने मुझे अपनी रचना के प्रथम
23 मेरी रचना सनातन काल से हुई।
24 जब सागर नहीं थे, जब जल से लबालब सोते नहीं थे,
25 मुझे पर्वतों—पहाड़ियों की स्थापना से पहले ही जन्म दिया गया।
26 धरती की रचना, या उसके खेत
27 मेरा अस्तित्व उससे भी पहले वहाँ था।
28 उसने जब आकाश में सघन मेघ टिकाये थे,
29 उसने समुद्र की सीमा बांधी थी
30 मैं दिन—प्रतिदिन आनन्द से परिपूर्ण होती चली गयी।
31 उसकी पूरी दुनिया से मैं आनन्दित थी।
32 “तो अब, मेरे पुत्रों, मेरी बात सुनो।
33 मेरे उपदेश सुनो और बुद्धिमान बनो।
34 वही जन धन्य है, जो मेरी बात सुनता और रोज मेरे द्वारों पर दृष्टि लगाये रहता
35 क्योंकि जो मुझको पा लेता वही जीवन पाता
36 किन्तु जो मुझको, पाने में चूकता, वह तो अपनी ही हानि करता है।