Neemias 9

HIN2010

1 फिर उसी महीने की चौबीसवीं तारीख को एक दिन के उपवास के लिये इस्राएल के लोग परस्पर एकत्र हुए। उन्होंने यह दिखने के लिये कि वे दु:खी और बेचैन हैं, उन्होंने शोक वस्त्र धारण किये, अपने अपने सिरों पर राख डाली।

2 वे लोग जो सच्चे इस्राएली थे, उन्होंने बाहर के लोगों से अपने आपको अलग कर दिया। इस्राएली लोगों ने मन्दिर में खड़े होकर अपने और अपने पूर्वजों के पापों को स्वीकार किया।

3 वे लोग वहाँ लगभग तीन घण्टे खड़े रहे और उन्होंने अपने यहोवा परमेश्वर की व्यवस्था के विधान की पुस्तक का पाठ किया और फिर तीन घण्टे और अपने यहोवा परमेश्वर की उपासना करते हुए उन्होंने स्वयं को नीचे झुका लिया तथा अपने पापों को स्वीकार किया।

4 फिर लेवीवंशी येशू, बानी, कदमीएल, शबन्याह, बुन्नी, शेरेब्याह, बानी और कनानी सीढ़ियों पर खड़े हो गये और उन्होंने अपने परमेश्वर यहोवा को ऊँचे स्वर में पुकारा।

5 इसके बाद लेवीवंशी येशू, कदमीएल, बानी, हशबन्याह, शेरेब्याह, होदियाह, शबन्याह और पतहयाह ने फिर कहा। वे बोले: “खड़े हो जाओ और अपने यहोवा परमेश्वर की स्तुति करो!

6 तू तो परमेश्वर है! यहोवा,

7 यहोवा परमेश्वर तू ही है,

8 तूने यह देखा था कि वह सच्चा और निष्ठावान था तेरे प्रति।

9 यहोवा देखा था तड़पते हुए तूने हमारे पूर्वजों को मिस्र में।

10 फ़िरौन को तूने दिखाये थे चमत्कार।

11 सामने उनके लाल सागर को विभक्त किया था तूने,

12 मीनार जैसे बादल से दिन में उन्हें राह तूने दिखाई

13 फिर तू उतरा सीनै पहाड़ पर और आकाश से

14 तूने बताया उन्हें सब्त यानी अपने विश्राम के विशेष दिन के विषय में।

15 जब उनको भूख लगी,

16 किन्तु वे पूर्वज हमारे, हो गये अभिमानी: वे हो गये हठी थे।

17 कर दिया उन्होंने मना सुनने से।

18 चाहे उन्होंने बना लिया सोने का बछड़ा और कहा,

19 तू बहुत ही दयलु है!

20 निज उत्तम चेतना, तूने दी उनको ताकि तू विवेकी बनाये उन्हें।

21 तूने रखा उनका ध्यान चालीस वरसों तक मरुस्थल में।

22 यहोवा तूने दिये उनको राज्य, और उनको दी जातियाँ

23 वंशज दिये तूने अनन्त उन्हें जितने अम्बर में तारे हैं।

24 धरती वह उन वंशजों ने ले ली।

25 शक्तिशाली नगरों को उन्होंने हरा दिया।

26 और फिर उन्होंने मुँह फेर लिया तुझसे था।

27 सो तूने उन्हें पड़ने दिया उनके शत्रुओं के हाथों में।

28 किन्तु, जैसे ही चैन उन्हें मिलता था,

29 तूने चेताया उन्हें।

30 “तू था बहुत सहनशील, साथ हमारे पूर्वजों के,

31 “किन्तु तू कितना दयालु है!

32 परमेश्वर हमारा है, महान परमेश्वर!

33 किन्तु हे परमेश्वर! जो कुछ भी घटना है

34 हमारे राजाओं ने मुखियाओं, याजकों ने और पूर्वजों ने नहीं पाला तेरी शिक्षाओं को!

35 यहाँ तक कि जब पूर्वज हमारे अपने राज्य में रहते थे, उन्होंने नहीं सेवा की तेरी!

36 और अब हम बने दास हैं:

37 इस धरती की फसल है भरपूर

38 “सो सोचकर इन सभी बातों के बारे में

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