1 यहोवा यदि मैं तुझसे तर्क करता हूँ,
2 तूने उन दुष्ट लोगों को यहाँ बसाया है।
3 किन्तु मेरे यहोवा, तू मेरे हृदय को जानता है।
4 कितने अधिक समय तक भूमि प्यासी पड़ी रहेगी
5 “यिर्मयाह, यदि तुम मनुष्यों की पग दौड़ में थक जाते हो
6 ये लोग तुम्हारे अपने भाई हैं।
7 “मैंने (यहोवा) अपना घर छोड़ दिया है।
8 मेरे अपने लोग मेरे लिये जंगली शेर बन गये हैं।
9 मेरे अपने लोग गिद्धों से घिरा, मरता हुआ जानवर बन गये हैं।
10 अनेक गडेरियों (प्रमुखों) ने मेरे अंगूर के खेतों को नष्ट किया है।
11 उन्होंने मेरे खेत को मरुभूमि में बदल दिया है।
12 अनेक सैनिक उन सूनी पहाड़ियों को रौंदते गए हैं।
13 लोग गेहूँ बोएंगे, किन्तु वे केवल काँटे ही काटेंगे।
14 यहोवा जो कहता है, वह यह है: “मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैं इस्राएल देश के चारों ओर रहने वाले सभी लोगों के लिये क्या करुँगा। वे लोग बहुत दुष्ट हैं। उन्होंने उस देश को नष्ट किया जिसे मैंने इस्राएल के लोगों को दिया था। मैं उन दुष्ट लोगों को उखाडूँगा और उनके देश से उन्हें बाहर फेंक दूँगा। मैं उनके साथ यहूदा के लोगों को भी उखाड़ूँगा।
15 किन्तु उन लोगों को उनके देश से उखाड़ फेंकने के बाद मैं उनके लिये अफसोस करुँगा। मैं हर एक परिवार को उनकी अपनी सम्पत्ति और अपनी भूमि पर वापस लाऊँगा।
16 मैं चाहता हूँ कि वे लोग अब मेरे लोगों की तरह रहना सीख लें। बीते समय में उन लोगों ने हमारे लोगों को शपथ खाने के लिये बाल के नाम का उपयोग करना सिखाया। अब, मैं चाहता हूँ कि वे लोग अपना पाठ ठीक वैसे ही अच्छी तरह पढ़ लें। मैं चाहता हूँ कि वे लोग मेरे नाम का उपयोग करना सीखें। मैं चाहता हूँ कि वे लोग कहें, ‘क्योंकि यहोवा शाश्वत है।’ यदि वे लोग वैसा करते हैं तो मैं उन्हें सफल होने दूँगा और उन्हें अपने लोगों के बीच रहने दूँगा।
17 किन्तु यदि कोई राष्ट्र मेरे सन्देश को अनसुना करता है तो मैं उसे पूरी तरह नष्ट कर दूँगा। मैं उसे सूखे पौधे की तरह उखाड़ डालूँगा।” यह सन्देश यहोवा का है।