Jó 20

HIN2010

1 इस पर नामात प्रदेश के सोपर ने उत्तर दिया:

2 “अय्यूब, तेरे विचार विकल है, सो मैं तुझे निश्चय ही उत्तर दूँगा।

3 तेरे सुधान भरे उत्तर हमारा अपमान करते हैं।

6 चाहे दुष्ट व्यक्ति का अभिमान नभ छू जाये,

7 किन्तु वह सदा के लिये नष्ट हो जायेगा जैसे स्वयं उसका देहमल नष्ट होगा।

8 वह ऐसे विलुप्त होगा जैसे स्वप्न शीघ्र ही कहीं उड़ जाता है। फिर कभी कोई उसको देख नहीं सकेगा,

9 वे व्यक्ति जिन्होंने उसे देखा था फिर कभी नहीं देखेंगे।

10 जो कुछ भी उसने (दुष्ट) गरीबों से लिया था उसकी संताने चुकायेंगी।

11 जब वह जवान था, उसकी काया मजबूत थी,

12 “दुष्ट के मुख को दुष्टता बड़ी मीठी लगती है,

13 बुरा व्यक्ति उस बुराई को थामे हुये रहेगा,

14 किन्तु उसके पेट में उसका भोजन जहर बन जायेगा,

15 दुष्ट सम्पत्तियों को निगल जाता है किन्तु वह उन्हें बाहर ही उगलेगा।

16 दुष्ट जन साँपों के विष को चूस लेगा

17 फिर दुष्ट जन देखने का आनन्द नहीं लेंगे

18 दुष्ट को उसका लाभ वापस करने को दबाया जायेगा।

19 क्योंकि उस दुष्ट जन ने दीन जन से उचित व्यवहार नहीं किया।

20 “दुष्ट जन कभी भी तृप्त नहीं होता है,

21 जब वह खाता है तो कुछ नहीं छोड़ता है,

22 जब दुष्ट जन के पास भरपूर होगा

23 दुष्ट जन वह सब कुछ खा चुकेगा जिसे वह खाना चाहता है।

24 सम्भव है कि वह दुष्ट लोहे की तलवार से बच निकले,

25 वह काँसे का बाण उसके शरीर के आर पार होगा और उसकी पीठ भेद कर निकल जायेगा।

26 उसके सब खजाने नष्ट हो जायेंगे,

27 स्वर्ग प्रमाणित करेगा कि वह दुष्ट अपराधी है,

28 जो कुछ भी उसके घर में है,

29 यह वही है जिसे परमेश्वर दुष्टों के साथ करने की योजना रचता है।

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